4 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इक्वल अर्थ मैप प्रोजेक्शन को बढ़ावा देने वाले प्रस्ताव को 164-1 के भारी बहुमत से मंजूरी दी. छह देश मतदान से दूर रहे, जबकि अमेरिका ने प्रस्ताव का विरोध किया. हालांकि यह प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं है और इससे मर्केटर मैप पर रोक नहीं लगती. नए मैप का मकसद दुनिया के देशों और महाद्वीपों का क्षेत्रफल सही अनुपात में दिखाना है, न कि किसी देश की राजनीतिक सीमा या क्षेत्रीय दावे को बदलना. यानी नक्शे में सिर्फ आकार बदला है, क्षेत्रफल और सीमाएं नहीं. इसलिए इस बदलाव का जम्मू-कश्मीर विवाद पर कोई सीधा कानूनी असर नहीं है. फिर भी नक्शे में जम्मू-कश्मीर को कैसे दिखाया जाता है, इसे लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच बयानबाजी तेज हो गई है.
भारत ने क्या कहा?
भारत ने प्रस्ताव का समर्थन किया है, लेकिन उसका कहना है कि इसे किसी एक खास मैप प्रोजेक्शन के समर्थन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. भारत के मुताबिक अलग-अलग नक्शों का इस्तेमाल अलग-अलग जरूरतों के लिए किया जाता है. किसी मैप में क्षेत्रफल सही दिखाना जरूरी होता है, तो किसी में दिशा, कोण या दूरी को प्राथमिकता दी जाती है. इसलिए भारत ने तकनीकी रूप से तटस्थ रुख अपनाया है. साथ ही विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि भारत का संप्रभु क्षेत्र, जिसमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं, किसी भी मैप में भारत के आधिकारिक नक्शे के मुताबिक ही दिखना चाहिए. भारत ने अपने क्षेत्र के किसी भी गलत या भ्रामक चित्रण को अस्वीकार्य बताया है.
Our response to media queries regarding a UN General Assembly resolution on equal-area world map ⬇️
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— Randhir Jaiswal (@MEAIndia) September 6, 2026
पाकिस्तान ने क्या कहा?
पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर को विवादित क्षेत्र बताते हुए फिर से पुराना राग अलापा है. उसका कहना है कि कश्मीर का अंतिम फैसला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों और कश्मीरी लोगों की इच्छा के मुताबिक होना चाहिए. पाकिस्तान लंबे समय से भारत के आधिकारिक नक्शों को खारिज करता रहा है और उसका तर्क है कि भारत की ओर से किसी नक्शे में जम्मू-कश्मीर को अपना हिस्सा दिखाने से इस क्षेत्र की विवादित स्थिति खत्म नहीं हो जाती.
UN ने क्या कहा?
भारत-पाकिस्तान के बीच विवाद इक्वल अर्थ मैप के क्षेत्रफल संबंधी बदलाव से ज्यादा जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक चित्रण को लेकर है. अहम बात यह है कि UN के नए प्रस्ताव ने कश्मीर की राजनीतिक स्थिति पर कोई फैसला नहीं दिया है. UN ने इक्वल अर्थ के मैप के साथ ये बात स्पष्ट भी की है. यानी जम्मू-कश्मीर की स्थिति जस की तस है. UN ने नए नक्शे को लेकर 4 बातें कही हैं…
- इस नक्शे पर दिखाई गई सीमाओं, देशों के नाम और इस्तेमाल किए गए चिन्हों का मतलब यह नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र उन्हें आधिकारिक तौर पर मान्यता या समर्थन देता है.
- सूडान और दक्षिण सूडान के बीच अंतिम सीमा अभी तय नहीं हुई है.
- जम्मू-कश्मीर में भारत और पाकिस्तान के बीच सहमति वाली लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) को नक्शे पर बिंदीदार रेखा से लगभग दिखाया गया है. जम्मू-कश्मीर की अंतिम स्थिति पर भारत और पाकिस्तान के बीच अभी सहमति नहीं बनी है.
- फॉकलैंड द्वीप (माल्विनास) की संप्रभुता को लेकर अर्जेंटीना और ब्रिटेन के बीच विवाद है.
पुराना नक्शा- मर्केटर मैप, नया नक्शा- इक्वल अर्थ मैप.
मर्केटर की जगह इक्वल अर्थ क्यों?
मर्केटर मैप को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि इसे बनाया ही किस उद्देश्य से गया था. 1569 में जेरार्डस मर्केटर ने यह प्रोजेक्शन तैयार किया था. इसका मकसद पृथ्वी के हर हिस्से का वास्तविक क्षेत्रफल दिखाना नहीं, बल्कि समुद्र में जहाजों के लिए दिशा तय करना आसान बनाना था. मर्केटर मैप में लगातार एक ही दिशा में आगे बढ़ने वाले जहाज का रास्ता सीधी रेखा में दिखता है. इसी वजह से यह समुद्री नेविगेशन के लिए बेहद उपयोगी रहा है.
फिर मर्केटर मैप में दिक्कत क्या है?
समस्या तब शुरू होती है जब इस मैप को देशों और महाद्वीपों के वास्तविक आकार की तुलना के लिए इस्तेमाल किया जाता है. भूमध्य रेखा से जैसे-जैसे उत्तर या दक्षिण की ओर जाते हैं, जमीन का आकार मैप पर जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है. इसका सबसे चर्चित उदाहरण ग्रीनलैंड और अफ्रीका हैं. मर्केटर मैप में ग्रीनलैंड अफ्रीका के लगभग बराबर दिख सकता है, जबकि वास्तविकता में अफ्रीका करीब 14 गुना बड़ा है.
अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3.03 करोड़ वर्ग किमी है, जबकि ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 21.7 लाख वर्ग किमी है. इसी तरह रूस, कनाडा और उत्तरी यूरोप जैसे ऊंचे अक्षांश वाले इलाके भी वास्तविकता से बड़े नजर आते हैं. दूसरी तरफ अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण एशिया अपेक्षाकृत छोटे दिखाई देते हैं. यानी मर्केटर मैप दिशा के मामले में उपयोगी है, लेकिन क्षेत्रफल की तुलना में तस्वीर बिगाड़ देता है.
इक्वल अर्थ क्या बदलता है?
इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन को 2018 में कार्टोग्राफर बोजन साव्रिच, टॉम पैटरसन और बर्नहार्ड जेनी ने विकसित किया था. यह एक समान क्षेत्रफल वाला प्रोजेक्शन है. इसका मतलब है कि अलग-अलग देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल का आपसी अनुपात काफी हद तक सही रखा जाता है. इसलिए इसमें अफ्रीका का आकार उसके वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब नजर आता है.
इस बदलाव का असर खासतौर पर स्कूलों, एटलस, मीडिया और डिजिटल मैप्स में दिखाई दे सकता है. बच्चों को अफ्रीका पहले से कहीं बड़ा और यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका अपेक्षाकृत छोटा दिखाई देगा. टोगो ने साल के अंत तक अपनी स्कूल की भूगोल सामग्री अपडेट करने की योजना भी बताई है.
किसे फायदा, किसे नुकसान?
- मर्केटर में बड़ा दिखता था: ग्रीनलैंड, रूस, कनाडा और उत्तरी यूरोप
- मर्केटर में छोटा दिखता था: अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण एशिया
- नए मैप का फायदा: क्षेत्रफल की तुलना ज्यादा सही होगी
- नाविकों के लिए: मर्केटर मैप अब भी उपयोगी रहेगा
इसलिए नए मैप से सबसे ज्यादा बदलाव हमारी दुनिया को देखने की समझ में आएगा, न कि देशों की सीमाओं में. नाविकों को मर्केटर छोड़ने की जरूरत नहीं है, क्योंकि समुद्री रास्तों और दिशा तय करने में वह आज भी उपयोगी है. दूसरी तरफ, अगर स्कूलों और सामान्य दुनिया के नक्शों में इक्वल अर्थ का इस्तेमाल बढ़ता है, तो लोगों को देशों और महाद्वीपों का वास्तविक आकार बेहतर समझ आएगा. नया मैप दुनिया नहीं बदल रहा, सिर्फ दुनिया को देखने का हमारा नजरिया बदल रहा है.























































