एक ही ब्रांड, वही Fanta और वही नाम, लेकिन भारत और UK में बिकने वाले इस सॉफ्ट ड्रिंक की सामग्री को लेकर बड़ा अंतर है। Reuters की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, लंदन में बिकने वाली Fanta के एक कैन में 63 कैलोरी हैं, जबकि भारत में बिकने वाली Fanta में चीनी की मात्रा करीब तीन गुना ज्यादा है।इतना ही नहीं, भारत वाली Fanta में आर्टिफिशियल फूड कलर भी इस्तेमाल होता है, जबकि यूरोप में ऐसे कुछ कलरेंट के साथ प्रमुख हेल्थ वॉर्निंग की व्यवस्था है। भारत में इसकी जानकारी कैन के पीछे छोटे अक्षरों में दी जाती है।
रिपोर्ट में सिर्फ एक सॉफ्ट ड्रिंक की रेसिपी पर सवाल का नहीं है। बल्कि, इस बात का भी है कि भारतीय ग्राहकों को पैकेज्ड फूड और ड्रिंक्स के अंदर मौजूद चीनी, रंग और दूसरे पोषक तत्वों की जानकारी कितनी साफ और आसानी से समझ आने वाली दी जा रही है।
UK और India की Fanta में इतना फर्क क्यों?
Reuters के मुताबिक लंदन में बिकने वाली Fanta के एक कैन में 63 कैलोरी हैं। भारत में मिलने वाले उसी ब्रांड के उत्पाद में चीनी की मात्रा करीब तीन गुना बताई गई है। यही अंतर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है कि आखिर एक ही ग्लोबल ब्रांड अलग-अलग देशों में इतने अलग फॉर्मूले के साथ क्यों बिकता है। खाद्य कंपनियां अलग-अलग देशों में स्थानीय नियमों, स्वाद, कीमत और उपभोक्ता पसंद के हिसाब से अपने उत्पादों की रेसिपी में बदलाव कर सकती हैं। लेकिन, हेल्थ एक्सपर्ट्स और एक्टिविस्ट्स की चिंता यह है कि ज्यादा चीनी वाले उत्पादों को खरीदते समय ग्राहक को इसकी जानकारी कितनी साफ दिखाई देती है। यही वजह है कि भारत में फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी की मांग लंबे समय से उठती रही है।
Fanta के ऑरेंज रंग पर भी सवाल
भारत में बिकने वाली Fanta में सिंथेटिक फूड कलर इस्तेमाल होने की बात खुद Coca-Cola India की वेबसाइट पर भी दर्ज है। कंपनी का कहना है कि Fanta Orange में सिंथेटिक फूड कलर इस्तेमाल होता है और इसे पैकेज पर घोषित किया जाता है। कंपनी यह भी कहती है कि इस्तेमाल किया गया कलर तय सीमा के भीतर होता है और भारत के लागू फूड सेफ्टी नियमों का पालन करता है। ऐसे में कंपनी की तरफ से बेचे जाने वाले उत्पादों से ज्यादा उन फूड सेफ्टी नियमों पर सवाल उठते हैं, जो यूरोप और अमेरिका में सेहत के लिए खराब मानी जाने वाली चीजों को भारत में इस्तेमाल की इजाजत देते हैं।
लेबलिंग बदलने से कतरा रहीं कंपनियां
भारत में यह बहस लंबे समय से इस बात पर चल रही है कि पैकेज्ड फूड पर पोषण संबंधी जानकारी सिर्फ पीछे की टेबल में दी जाए या सामने से ही ग्राहकों को चेतावनी दी जाए। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी FSSAI ने अगस्त में फ्रंट पर रंगीन वॉर्निंग लेबल लगाने की अपनी कोशिश से पीछे हटते हुए चीनी, वसा और नमक की जानकारी देने वाली ब्लैक-एंड-व्हाइट न्यूट्रिशन टेबल के मॉडल को आगे बढ़ाने की बात कही। रेगुलेटर ने तर्क दिया कि भारतीय खाने के स्वाद और खान-पान की आदतें पश्चिमी देशों से अलग हैं।
वॉर्निंग लेबल का विरोध क्यों?
रिपोर्ट में मार्च 2026 की एक बैठक की रिकॉर्डिंग्स के हवाले से बताया गया है कि FSSAI के साथ इंडस्ट्री प्रतिनिधियों ने फ्रंट-ऑफ-पैक वॉर्निंग लेबल के असर पर सवाल उठाए थे। 19 मार्च की बैठक में Coca-Cola India ने कहा कि उपभोक्ता सिर्फ किसी चिन्ह या आइकन को देखकर अपने खान-पान में बड़ा बदलाव नहीं करेगा। चेतावनी लेबल लगाने से लोग मीठे या नमकीन उत्पादों का सेवन पूरी तरह बंद नहीं कर देंगे। इसके अलावा डॉक्टर पहले से ही मरीजों को बताते हैं कि किन चीजों से बचना चाहिए।
यूरोप में Coca-Cola का मॉडल अलग
Coca-Cola और उसके बॉटलिंग पार्टनर्स यूरोप के करीब दो दर्जन बाजारों में ट्रैफिक-लाइट स्टाइल लेबलिंग का इस्तेमाल कर चुके हैं। इस तरह के लेबल में अलग-अलग पोषक तत्वों की मात्रा को रंगों के जरिए आसानी से समझाने की कोशिश की जाती है। Coca-Cola HBC ने अपनी वेबसाइट पर इसे साफ और पारदर्शी जानकारी देने वाला मॉडल बताया है। यहीं से भारत में सवाल उठता है कि अगर ग्राहकों को यूरोपीय बाजारों में ज्यादा साफ जानकारी देने के लिए अलग तरह की लेबलिंग अपनाई जा सकती है, तो भारत में ऐसा मॉडल स्वीकार करने को लेकर इतनी आपत्ति क्यों है।























































