उत्तर प्रदेश में सहायक अभियोजन अधिकारी (APO) भर्ती 2025 को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) से जवाब मांगा है. अदालत ने प्रलिम्स परीक्षा के रिजल्ट में आरक्षण नियमों के पालन को लेकर सवाल उठाए हैं और पूछा है कि चयन प्रक्रिया किस आधार पर अपनाई गई. कोर्ट ने कहा कि अगर ओपन कैटेगरी में मेरिट के बजाय किसी अन्य आधार पर चयन हुआ है तो यह संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन माना जा सकता है. आयोग को विस्तृत हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं.न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की पीठ ने आयोग से पूछा कि प्रलिम्स परीक्षा का रिजल्ट तैयार करते समय किन नियमों और प्रक्रिया का पालन किया गया. कोर्ट ने कहा कि अनारक्षित या ओपन कैटेगरी का मतलब ऐसा वर्ग है जहां सभी योग्य उम्मीदवारों को केवल उनकी मेरिट के आधार पर अवसर मिलना चाहिए. इसमें किसी भी वर्ग के अभ्यर्थी को उसकी योग्यता के अनुसार स्थान दिया जाना चाहिए. अगर इस सिद्धांत का पालन नहीं किया गया तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 16 में दिए गए समानता और समान अवसर के अधिकार के खिलाफ माना जा सकता है.
7 अगस्त तक हलफनामा
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने आयोग से कहा कि अगर प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम पूरी तरह मेरिट के आधार पर तैयार किया गया है तो इसे शपथ पत्र (एफिडेविट) के माध्यम से स्पष्ट किया जाए. अदालत ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित रजत यादव फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें ओपन कैटेगरी में सभी वर्गों के अभ्यर्थियों को केवल मेरिट के आधार पर शामिल करने की बात कही गई थी.
10 अगस्त को होगी अगली सुनवाई
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अनुराग त्रिपाठी तथा वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप त्रिवेदी और अवनीश त्रिपाठी ने पक्ष रखा. अदालत ने आयोग को अपनी पूरी चयन प्रक्रिया स्पष्ट करते हुए 7 अगस्त तक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. अब इस मामले की अगली सुनवाई 10 अगस्त को होगी, जिस पर भर्ती से जुड़े अभ्यर्थियों की नजरें टिकी हुई हैं.























































