सऊदी-यमन पर लगातार हो रहे हमले… क्या हूतियों पर बरसेंगी अमेरिकी मिसाइलें?

सऊदी अरब की राजधानी रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हूतियों के हमले ने पश्चिम एशिया में संघर्ष को और बढ़ा दिया है. 10 अक्टूबर 2026 को हुए हमले में 12 लोगों की मौत हुई और 309 लोग घायल हुए. 11 अक्टूबर को एयरपोर्ट के टर्मिनल-4 पर एक और हमला हुआ. इसमें आग लग गई, एक व्यक्ति की मौत हुई और 11 लोग घायल हुए. हूतियों ने सऊदी अरब पर आगे भी हमले करने की धमकी दी है. मृतकों में सऊदी अरब के अलावा बांग्लादेश, अमेरिका, जॉर्डन, फिलिस्तीन, सीरिया, सूडान और मिस्र के नागरिक शामिल थे.15 अक्टूबर को यमन के अदन शहर में हूती विद्रोहियों ने राष्ट्रपति भवन पर 5 बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं. हमले के समय प्रधानमंत्री शाया मोहसेन अल-जिंदानी और सरकार के कई मंत्री परिसर में मौजूद थे. 18 अक्टूबर को हूतियों ने सऊदी पर फिर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका सऊदी अरब के साथ मिलकर हूतियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में शामिल होने पर विचार कर रहा है. ऐसे में सवाल है कि क्या अमेरिका सीधे यमन में हमले करेगा, सऊदी अरब को सैन्य मदद देगा या कूटनीतिक दबाव के जरिए संकट को रोकने की कोशिश करेगा? आइए तीनों संभावनाओं को विस्तार से समझते हैं

ट्रंप के सामने पहला विकल्प सऊदी अरब के साथ मिलकर हूतियों के सैन्य ठिकानों पर हमले करना है. अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि वह इस पर विचार कर रहे हैं, लेकिन सीधे सैन्य कार्रवाई को लेकर अभी तक अंतिम फैसला घोषित नहीं किया गया है. इसलिए इसे तय सैन्य ऑपरेशन के बजाय एक संभावित विकल्प के रूप में देखना चाहिए.

अमेरिका पहले भी हूतियों के खिलाफ बड़ा सैन्य अभियान चला चुका है. अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, 15 मार्च 2025 से शुरू हुए ऑपरेशन रफ राइडर के तहत 27 अप्रैल तक 800 से अधिक ठिकानों पर हमले किए गए थे. अमेरिकी सेना ने कहा था कि इन कार्रवाइयों में हूतियों के कमांड सेंटर, हवाई रक्षा प्रणाली, हथियार बनाने की जगहें और मिसाइलों-ड्रोन के भंडार निशाने पर थे. हालांकि अमेरिकी ऑपरेशन से हूतियों की हमले करने की क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई.

2. सऊदी अरब की सुरक्षा मजबूत करना

अमेरिका सीधे हमले करने के बजाय सऊदी अरब की रक्षा में मदद बढ़ा सकता है. इसमें खुफिया जानकारी साझा करना, मिसाइल और ड्रोन हमलों की चेतावनी देना तथा हवाई रक्षा के लिए सहयोग शामिल हो सकता है. द वॉशिंगटन पोस्ट की 11 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका सऊदी अरब को खुफिया सहयोग दे रहा था, लेकिन उसने हूतियों के खिलाफ सीधे सैन्य समर्थन देने का फैसला नहीं किया था.यह विकल्प अमेरिका को सऊदी अरब की सुरक्षा में मदद देने का रास्ता देता है, जबकि सीधे युद्ध में शामिल होने का जोखिम कुछ हद तक सीमित रह सकता है. हालांकि, इससे यह गारंटी नहीं मिलती कि एयरपोर्ट, तेल सुविधाओं या दूसरे ठिकानों पर आगे हमले नहीं होंगे.

3. ईरान पर दबाव और कूटनीति

हूतियों के खिलाफ कार्रवाई का एक बड़ा पहलू ईरान की भूमिका है. अमेरिका और सऊदी अरब हूतियों को ईरान समर्थित संगठन मानते हैं. अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने 5 मार्च 2025 को हूती संगठन से जुड़े 7 सीनियर मेंबर्स पर कार्रवाई की थी. अमेरिका ने इन पर हथियारों की तस्करी और हथियारों की खरीद में शामिल होने के आरोप लगाए थे.ट्रंप प्रशासन ईरान पर दबाव बढ़ाकर हूतियों तक हथियार और आर्थिक मदद पहुंचने से रोकने की कोशिश कर सकता है. दूसरा रास्ता ओमान जैसे मध्यस्थ देशों के जरिए बातचीत का है. मई 2025 में ओमान ने अमेरिका और सना में हूती अधिकारियों के बीच सीजफायर की घोषणा की थी. इसके तहत दोनों पक्षों ने एक-दूसरे और लाल सागर व बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य में अमेरिकी जहाजों को निशाना नहीं बनाने पर सहमति जताई थी.

बाब-अल-मंदेब पर खतरा, दुनिया पर क्या असर?

यह संघर्ष सिर्फ सऊदी अरब और यमन तक सीमित नहीं है. बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है. यहां से जहाज स्वेज नहर के रास्ते एशिया और यूरोप के बीच सामान पहुंचाते हैं. इस रास्ते पर हमले बढ़ने से जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ सकता है, जिससे माल ढुलाई का समय और खर्च बढ़ सकता है.

US एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) के आंकड़ों के मुताबिक, बाब-अल-मंदेब से गुजरने वाले कच्चे तेल, कंडेनसेट और पेट्रोलियम उत्पादों की मात्रा 2023 में औसतन 93 लाख बैरल प्रतिदिन थी. 2024 में यह घटकर 41 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई. 2025 की पहली छमाही में यह लगभग 42 लाख बैरल प्रतिदिन थी.

क्या अमेरिकी हमला संघर्ष को और बढ़ा सकता है?

अमेरिका की सैन्य कार्रवाई से हूतियों की कुछ क्षमताओं को नुकसान पहुंच सकता है, लेकिन इससे संघर्ष खत्म होने की गारंटी नहीं है. हूती जवाब में सऊदी अरब के एयरपोर्ट, तेल सुविधाओं या समुद्री जहाजों को निशाना बना सकते हैं. इससे क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है. अमेरिका के सामने यह भी चुनौती है कि वह सऊदी अरब की सुरक्षा में मदद करते हुए ईरान के साथ चल रहे बड़े संघर्ष को और न बढ़ने दे.

इसके अलावा 3 नवंबर को अमेरिका में मिडटर्म इलेक्शन भी है. अगर अमेरिका हूतियों पर हमला करता है तो युद्ध और फैल सकता है. हूतियों के हमलों का जवाब देने से तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिसका असर चुनाव पर पड़ सकता है ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को चिंता है कि चुनाव में वह संसद के दोनों सदनों यानी प्रतिनिधि सभा और सीनेट पर अपना नियंत्रण खो सकती है. ट्रंप को इस बात का भी ध्यान रखना होगा.

फिलहाल सबसे अहम सवाल यह है कि ट्रंप सैन्य कार्रवाई को मंजूरी देते हैं या सऊदी अरब की रक्षा और कूटनीति पर जोर देते हैं. 11 अक्टूबर तक उपलब्ध रिपोर्टों में अमेरिकी राष्ट्रपति ने कार्रवाई पर विचार करने की बात कही थी, लेकिन अंतिम निर्णय की घोषणा नहीं की थी. इसलिए अमेरिकी हमले को तय मानकर चलना सही नहीं होगा.

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