कंपनी ने कहा कि हर भारतीय उद्यम की तरह, रिलायंस भी ऐसे भारत में विकसित हुआ है जो निवेश और इनोवेशन का स्वागत करता है—चाहे वह घरेलू हो या अंतरराष्ट्रीय-जो लोगों के जीवन को बेहतर बनाते हैं. यह खुलापन कानून के शासन पर आधारित है. रिलायंस ने कहा कि जैसा कि सरकार का भी कहना है, वह हर आवेदक (चाहे वह भारतीय हो या विदेशी) के लिए एक जैसी प्रक्रिया अपनाती है. कंपनी ने यह भी जोड़ा कि जियो की अपनी सैटेलाइट सेवाओं को भी अभी मंजूरियों का इंतजार है.
स्टारलिंक और मस्क के हालिया दावों से जुड़े विवाद पर सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत में काम करने वाली किसी भी कंपनी को देश के कानूनों का पालन करना होगा. उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का रुख शुरू से ही स्पष्ट और एक जैसा रहा है. सूत्रों ने इस सप्ताह की शुरुआत में कहा था कि सरकार का रुख बहुत साफ रहा है-और उस समय भी यही था जब उन्होंने आवेदन किया था—कि अगर आप भारतीय कानूनों का पालन नहीं करते हैं, तो आप यहां कारोबार नहीं कर सकते… इसलिए, यहां कारोबार करने के लिए आपको भारतीय कानूनों का पालन करना ही होगा.
एयरटेल स्टारलिंक से काफी आगे
हाल ही में ‘ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम 2026’ में, भारती एयरटेल के चेयरमैन सुनील मित्तल ने कहा कि उनका सैटेलाइट कम्युनिकेशन वेंचर ‘यूटेलसैट वनवेब’ (Eutelsat OneWeb), भारत में सेवाएं शुरू करने की कतार में एलन मस्क की ‘स्टारलिंक’ से काफी आगे है. उनके इस बयान ने देश के सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में रेगुलेटरी मंजूरियों और प्रतिस्पर्धा को लेकर चल रहे सार्वजनिक विवाद में एक नया मोड़ ला दिया है. मित्तल ने कहा कि मुझे लगता है कि मैं इस कतार में उनसे काफी आगे हूं. मैंने पांच साल पहले आवेदन किया था. उन्होंने आगे कहा कि हमारे पास अभी अनुमति नहीं है, इसलिए अगर हमें उनसे कुछ दिन पहले भी यह अनुमति मिल जाती है, तो हमें बहुत खुशी होगी. मित्तल ने बताया कि ‘वनवेब’ का ग्राउंड नेटवर्क तीन साल से तैयार है और इसके सैटेलाइट पांच साल से भारत के ऊपर मौजूद हैं, लेकिन कंपनी को अभी भी कमर्शियल कामकाज शुरू करने की अनुमति का इंतजार है.
संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का बयान
संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बताया कि तीन कंपनियों – मस्क की ‘स्टारलिंक’, रिलायंस की ‘जियो सैटकॉम’ और भारती समर्थित ‘यूटेलसैट वनवेब’ – को सैटेलाइट कम्युनिकेशन लाइसेंस मिल चुके हैं. उन्होंने कहा कि अमेज़न के ‘प्रोजेक्ट कुइपर’ ने भी दिलचस्पी दिखाई है, लेकिन उन्हें तय प्रक्रिया का पालन करना होगा. सिंधिया ने स्पष्ट किया कि सरकार द्वारा रेवेन्यू-आधारित चार्जिंग फ्रेमवर्क को अंतिम रूप देने और ऑपरेटरों द्वारा सुरक्षा शर्तों को पूरा करने के बाद ही स्पेक्ट्रम आवंटित किया जाएगा. उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) और दूरसंचार विभाग (DoT) सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की कीमत तय करने के फैसले के काफी करीब हैं. इस विवाद का मुख्य बिंदु लाइसेंस और ऑपरेशनल अप्रूवल (काम शुरू करने की मंजूरी) के बीच का अंतर है: सिर्फ लाइसेंस मिल जाने से ही कोई कंपनी कमर्शियल सेवाएं शुरू नहीं कर सकती. स्पेक्ट्रम का आवंटन और सुरक्षा शर्तों को पूरा करना अभी भी जरूरी कदम हैं.
आ रहा है रिलायंस का आईपीओ
यह विवाद रिलायंस के लिए एक अहम समय पर सामने आया है. कंपनी अपने डिजिटल सर्विस बिजनेस, ‘जियो प्लेटफॉर्म्स’ का आईपीओ (IPO) लाने की तैयारी कर रही है. जियो ने 27 करोड़ नए शेयरों (जो मौजूदा पूंजी का लगभग 3% है) के लिए 1,065 रुपये से 1,119 रुपये प्रति शेयर का प्राइस बैंड तय किया है. इसमें ‘ऑफर फॉर सेल’ (मौजूदा शेयरधारकों द्वारा शेयर बेचना) शामिल नहीं है. प्राइस बैंड के ऊपरी स्तर पर, इस बिक्री से लगभग 30,213 करोड़ रुपये जुटेंगे. यह अक्टूबर 2024 में हुई हुंडई मोटर इंडिया की 27,870 करोड़ रुपये की शेयर बिक्री से अधिक है, जो अब तक की सबसे बड़ी बिक्री थी. इस कीमत के हिसाब से कंपनी का मार्केट वैल्यूएशन लगभग 10.3 लाख करोड़ रुपये बैठता है, जो कंपनी द्वारा पहले बताए गए 11 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य से कुछ कम है. इसके लिए बोलियां 21 से 23 अक्टूबर तक लगाई जा सकेंगी, जबकि एंकर निवेशक 19 अक्टूबर को बोली लगा सकेंगे. उम्मीद है कि 28 अक्टूबर से शेयरों की ट्रेडिंग शुरू हो जाएगी.
ये भी है रिलायंस का प्लान
रिलायंस अपने सैटेलाइट प्रोजेक्ट पर भी काम कर रही है. इसमें ‘लो-अर्थ-ऑर्बिट’ (पृथ्वी के करीब की कक्षा) में लगभग 1,600 सैटेलाइट्स का एक नेटवर्क बनाने का प्रस्ताव है, जिसका मकसद 600,000 गांवों तक इंटरनेट कनेक्टिविटी पहुंचाना है. इससे जियो का सीधा मुकाबला स्टारलिंक से होगा. स्टारलिंक भी एक ऐसे बड़े बाजार में अपनी पहुंच बनाना चाहती है, जहां सैटेलाइट ब्रॉडबैंड के जरिए उन दूर-दराज के इलाकों और समुदायों तक इंटरनेट पहुंचाया जा सकता है, जहां सामान्य नेटवर्क की पहुंच बहुत कम या न के बराबर है. दिलचस्प बात यह है कि पिछले साल रिलायंस और स्पेसएक्स के बीच एक समझौता हुआ था, जिसमें जियो के रिटेल नेटवर्क के जरिए भारतीय ग्राहकों तक स्टारलिंक की सेवाएं पहुंचाने के तरीकों पर विचार किया जाना था.















