ईरान-इजरायल की लड़ाई से क्यों बढ़ रहीं तेल की कीमतें..?

इजराइल और ईरान के टकराव के बाद मिडिल ईस्ट में सीधी लड़ाई की आशंका बढ़ गई है. ईरान के हमले के फौरन बाद कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने लगीं. विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि अगर दोनों देशों के बीच तनाव बरकरार रहा तो तेल की कीमतें रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंचा सकती हैं.इसके अलावा वैश्विक आपूर्ति भी बाधित हो सकती है. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल तक भी जा सकती है. 3 अक्टूबर को ही कच्चे तेल की कीमतों में लगभग पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई. आइये समझते हैं कि ईरान-इजरायल की लड़ाई से तेल की कीमतें क्यों बढ़ रही हैं और क्या इसका आपकी जेब पर भी असर पड़ेगा?

ऑयल मार्केट में ईरान की क्या हैसियत?

ईरान के हमले के बाद इजरायल ने अभी तक जवाबी कार्रवाई नहीं की है. लेकिन इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने दो-टूक कहा है कि वो ईरान से बदला लेंगे. समय और जगह इजरायल तय करेगा. कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि इजरायल, ईरान के ऑयल टर्मिनलों और रिफाइनरियों के साथ-साथ परमाणु ठिकानों पर हमला करने की फिराक में है. एक पूर्व वरिष्ठ अमेरिकी सैन्य अधिकारी कहते हैं कि, “ईरान के ऐसे कई ठिकाने हैं जिन पर वे (इजरायल) हमला कर सकते हैं और ईरान उन्हें रोक नहीं पाएगा…’ अगर इजरायल कोई कदम उठाता है तो इससे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी तय है.

क्यों? क्योंकि ईरान कच्चे तेल के वैश्विक बाजार में एक प्रमुख खिलाड़ी है. यूएस एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (US Energy Information Administration) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक ईरान नौवां सबसे बड़ा तेल उत्पादक है. पिछले साल कुल ऑयल प्रोडक्शन में ईरान का 4% हिस्सा था. ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन है.

कितनी बढ़ सकती हैं कीमतें?

क्लियरव्यू एनर्जी कंसल्टिंग एजेंसी के विश्लेषकों के अनुसार अगर इजरायल, ईरान की तेल रिफाइनरियों पर हमला करता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़कर 86 डॉलर प्रति बैरल तक हो जाएंगी, जो कि जून में आखिरी बार हुआ था. कीमतें 100 डॉलर तक भी जा सकती हैं. इजरायल ने अभी भले ही जवाबी कार्रवाई नहीं की है लेकिन इंटरनेशनल मार्केट ट्रेंड के मुताबिक प्रतिक्रिया देने लगा है. 1 अक्टूबर को मिसाइल हमले से पहले तेल की कीमतें 71 डॉलर प्रति बैरल से थोड़ा ऊपर थीं. 2 अक्टूबर ब्रेंट क्रूड बुधवार को बढ़कर लगभग 76 डॉलर प्रति बैरल हो गया. इसके बाद 3 अक्टूबर को, कच्चे तेल की कीमतें 77.62 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं.आपको बता दें कि मार्च 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया था तो उसके तुरंत बाद तेल की कीमतें 124 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई थीं.

ईरान का एक कदम पड़ सकता है भारी

अभी तेल की कीमतों में मामूली बढ़ोतरी हुई है. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ईरान, फारस की खाड़ी के मुहाने पर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंद करने का फैसला करता है तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी. होर्मुज जलडमरूमध्य एक संकरा चैनल है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है. इसी रास्ते से अधिकतर कच्चे तेल का निर्यात भी किया जाता है. दुनिया के कुल तेल का पांचवां हिस्सा रोज़ाना इसी मार्ग से होकर गुजरता है. क्लियरव्यू का मानना है कि अगर तेहरान होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करके इज़रायल की कार्रवाई का जवाब देने का फैसला करता है तो तेल की कीमतें बढ़कर 101 डॉलर प्रति बैरल तक हो जाएंगी.

कौन सबसे ज्यादा होगा प्रभावित
यदि कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं तो आपकी जेब पर असर पड़ना तय है. सबसे ज्यादा असर अमेरिका में दिखेई देगा, जहां 5 नवंबर को चुनाव होने वाले हैं. यदि तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो गैस की कीमत भी बढ़ेगी. उदाहरण के लिए, तेल की कीमतों में 10 प्रतिशत की वृद्धि गैसोलीन की कीमतों में 10 प्रतिशत की वृद्धि के बराबर है. इसी तरह, ब्रिटेन भी इसकी चपेट में आएगा.

भारत पर क्यों नहीं पड़ेगा असर?
भारत की बात करें तो यह पश्चिम एशियाई देशों के तेल पर काफी ज्यादा निर्भर है, जिसमें ईरान भी है. हालांकि ईरान से हमारा तेल का आयात बहुत कम है. एक तरीके से न के बराबर. भारत वर्तमान में रूस, इराक, सऊदी अरब, अबू धाबी और अमेरिका सहित लगभग 40 विभिन्न देशों से तेल आयात करता है. इसका मतलब यह है कि किसी एक देश पर निर्भर नहीं है. हालांकि, अगर लड़ाई आगे बढ़ती है तो वैश्विक तेल बाज़ारों में कीमतों अस्थिर होंगी. इसकी वजह से भारत में भी अस्थायी तौर पर ऐसे की कीमतों में उछाल आ सकता है. पेट्रोल और डीजल की कीमतें कुछ समय के लिए बढ़ सकती हैं.

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