सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम चुनावी मुद्दे पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है। मामला निर्विरोध चुनावों में मतदाताओं को NOTA (None of the Above) का विकल्प न देने से जुड़ा है। अदालत में दायर एक याचिका में जनप्रतिनिधि अधिनियम, 1951 की धारा 53(2) को चुनौती दी गई है, जो यह प्रावधान करती है कि यदि किसी चुनाव क्षेत्र में केवल एक ही उम्मीदवार नामांकन पत्र दाखिल करता है और उसका नामांकन वैध पाया जाता है, तो उसे निर्विरोध विजेता घोषित कर दिया जाता है और मतदान की आवश्यकता नहीं होती।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह प्रावधान मतदाताओं के लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करता है। यदि किसी सीट पर केवल एक उम्मीदवार हो, तब भी मतदाताओं को मतदान करने और अपनी असहमति जताने का अधिकार होना चाहिए। NOTA का विकल्प मतदाताओं को यह अवसर देता है कि वे किसी भी उम्मीदवार को चुनने के बजाय अपनी नापसंदगी दर्ज कर सकें। याचिका में कहा गया है कि वर्तमान व्यवस्था में यह अधिकार छिन जाता है और जनता की भागीदारी घटती है।सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से सीधा सवाल किया – “जब एक से अधिक उम्मीदवार वाले चुनाव में NOTA का विकल्प दिया जाता है, तो फिर एक उम्मीदवार वाले चुनाव में यह अधिकार क्यों नहीं?” अदालत ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में मतदाता की राय को हर हाल में महत्व दिया जाना चाहिए, चाहे चुनाव में प्रतिस्पर्धा हो या न हो।
केंद्र सरकार ने अपने जवाब में कहा कि धारा 53(2) का उद्देश्य चुनावी प्रक्रिया को सरल और समयबचत करने वाला बनाना है। यदि केवल एक उम्मीदवार हो, तो चुनाव कराने में सरकारी संसाधनों का उपयोग अनावश्यक होगा। हालांकि, अदालत ने इस तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि संसाधन बचत के नाम पर मतदाताओं के अधिकार को सीमित करना उचित नहीं है।चुनाव आयोग ने इस मुद्दे पर विचार करने की बात कही है और कोर्ट को आश्वस्त किया कि वह इस पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश करेगा। अब अगली सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि क्या निर्विरोध चुनाव की वर्तमान व्यवस्था में बदलाव होगा और मतदाताओं को हर परिस्थिति में NOTA का अधिकार मिलेगा।यह मामला लोकतांत्रिक मूल्यों और मतदाता अधिकारों की रक्षा से जुड़ा है, और इसका फैसला भविष्य में चुनावी प्रक्रिया पर गहरा असर डाल सकता है।















