आगामी उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी इंडी गठबंधन ने राजनीतिक समीकरण बदलने के इरादे से बड़ा दांव चलने की तैयारी शुरू कर दी है। सूत्रों के अनुसार, गठबंधन एक गैर-कांग्रेसी उम्मीदवार को मैदान में उतारने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य भाजपा विरोधी वोटों को एकजुट करना और चुनाव में विपक्षी एकजुटता को मजबूती देना है।
राहुल गांधी के आवास पर हाल ही में हुई विपक्षी दलों की अहम बैठक में इस मुद्दे पर गहन चर्चा हुई। बैठक में कांग्रेस समेत कई प्रमुख विपक्षी दलों के वरिष्ठ नेताओं ने भाग लिया। सूत्रों का कहना है कि बैठक में कई संभावित नामों पर विचार किया गया, जिनमें से कुछ ऐसे नेता शामिल हैं, जिनकी स्वीकार्यता न केवल विपक्षी खेमे में बल्कि कुछ तटस्थ राजनीतिक समूहों में भी है। इस रणनीति के पीछे यह सोच है कि गैर-कांग्रेसी चेहरे को उतारकर कांग्रेस पर “प्रधान विपक्षी दल” के वर्चस्व का आरोप लगाए बिना व्यापक समर्थन जुटाया जा सके।
बैठक में शामिल नेताओं ने यह भी माना कि उपराष्ट्रपति चुनाव सिर्फ संवैधानिक पद का चुनाव नहीं है, बल्कि यह 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए विपक्ष की एकता और ताकत का भी संदेश देगा। इंडी गठबंधन का मानना है कि अगर उपराष्ट्रपति पद के लिए साझा उम्मीदवार उतारा गया और उसे व्यापक समर्थन मिला, तो यह भाजपा के राजनीतिक प्रभाव को चुनौती देने का संकेत होगा।
जानकारी के अनुसार, उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया में सभी दलों की राय ली जाएगी और अंतिम नाम सामूहिक सहमति से तय किया जाएगा। गठबंधन के सूत्रों का कहना है कि यह फैसला न केवल राजनीतिक संतुलन बनाएगा बल्कि विभिन्न राज्यों और जातीय समूहों में संदेश भी देगा कि विपक्ष एकजुट है और किसी एक दल के वर्चस्व में नहीं चल रहा।
विश्लेषकों का मानना है कि गैर-कांग्रेसी उम्मीदवार उतारने का फैसला विपक्ष के लिए “गेम-चेंजर” साबित हो सकता है, बशर्ते सभी दल बिना शर्त इसके पीछे खड़े हों। वहीं, भाजपा इस पर करीबी नजर रखे हुए है और संभव है कि वह भी अपने पत्ते उसी हिसाब से खेले। कुल मिलाकर, उपराष्ट्रपति चुनाव भारतीय राजनीति में एक नई रणनीतिक जंग का मंच बनने जा रहा है।















