मुजफ्फरनगर की सामाजिक कार्यकर्ता क्रांतिकारी शालू सैनी एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने एक बुजुर्ग महिला की बेटी बनकर उनकी अंतिम क्रिया पूरी की और विधि-विधान से मुखाग्नि दी। यह कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि वर्षों से वह लावारिसों के अंतिम संस्कार का जिम्मा उठा रही हैं। उनकी इस निस्वार्थ सेवा ने उन्हें “लावारिसों की वारिस” की उपाधि दिलाई है, जो जनता द्वारा स्वयं उन्हें दी गई है।
निस्वार्थ समाज सेवा की मिसाल
शालू सैनी न केवल अपने जिले में, बल्कि पूरे देश में अपनी मानवता और सेवा भाव के लिए प्रसिद्ध हो गई हैं। समाज सेवा के नाम पर जहां कई लोग चंदा इकट्ठा करते हैं, वहीं शालू सैनी ने आज तक समाज सेवा के लिए किसी से कोई आर्थिक सहायता नहीं ली। उन्होंने अपने जीवन को पूरी तरह से जरूरतमंदों की मदद के लिए समर्पित कर दिया है।
समाज सेवा को नहीं बनाया व्यवसाय
आज के दौर में समाज सेवा के नाम पर कई संगठन और लोग खुद को समाजसेवी बताते हैं, लेकिन असल में वे अपनी छवि चमकाने और धन एकत्र करने में लगे रहते हैं। इसके विपरीत, शालू सैनी ने समाज सेवा को कभी रोजगार का जरिया नहीं बनाया, बल्कि इसे अपने जीवन का उद्देश्य बनाया है। उनकी सेवाओं को देखकर यह कहा जा सकता है कि “यदि कोई कार्य सच्चे मन से किया जाए, तो खुदा भी उस पर मेहरबान होता है।”
जनता का भरोसा, मानवता की सच्ची मिसाल
मुजफ्फरनगर के कृष्णापुरी मोहल्ले की निवासी शालू सैनी ने यह साबित कर दिया है कि सच्ची समाज सेवा दिखावे से नहीं, बल्कि कर्म से होती है। उनका निस्वार्थ भाव से किया गया कार्य समाज के लिए एक प्रेरणा है। जरूरतमंदों की मदद करना, लावारिसों का अंतिम संस्कार करना, और समाज के उपेक्षित वर्ग के लिए खड़ा होना—इन सबके लिए उन्होंने अपने जीवन को समर्पित कर दिया है।
समाज को ऐसी प्रेरणाओं की जरूरत
आज के समय में जब समाज सेवा का मतलब सिर्फ प्रचार और चंदा इकट्ठा करना बन गया है, ऐसे में शालू सैनी जैसी शख्सियत समाज के लिए एक प्रकाश स्तंभ की तरह हैं। उनकी निस्वार्थ सेवा से न केवल मुजफ्फरनगर बल्कि पूरे देश को सीख लेने की जरूरत है।















