डीडवाना। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि भारत का वास्तविक और शाश्वत कर्तव्य दुनिया को मर्यादा का पाठ पढ़ाना है, लेकिन यह कार्य केवल भाषणों, उपदेशों या पुस्तकों से संभव नहीं है। इसके लिए भारतीय समाज को अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। भागवत डीडवाना के छोटी खाटू में जैन समाज की ओर से आचार्य महाश्रमण के सानिध्य में आयोजित 162वें मर्यादा महोत्सव कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत की पहचान केवल ज्ञान, दर्शन या संस्कृति से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और जीवन पद्धति से होती है।मोहन भागवत ने कहा कि पुस्तकों में ज्ञान सुरक्षित रहता है और भाषणों को लोग ध्यान से सुनते भी हैं, लेकिन जब तक उस ज्ञान को व्यवहार में नहीं उतारा जाता, तब तक उसका वास्तविक प्रभाव समाज और दुनिया पर नहीं पड़ता। उन्होंने स्पष्ट किया कि मर्यादा केवल नियमों का पालन नहीं है, बल्कि आत्मसंयम, सह-अस्तित्व, करुणा और जिम्मेदारीपूर्ण आचरण का नाम है। यही वे मूल्य हैं, जिन्हें अपनाकर भारत विश्व को दिशा दे सकता है।
उन्होंने शाश्वत मूल्यों की चर्चा करते हुए कहा कि समय के साथ परिस्थितियां बदलती रहती हैं, लेकिन मूल्यों का स्वरूप स्थायी होता है। आवश्यकता इस बात की है कि उन शाश्वत मूल्यों को वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप समझा जाए और जीवन में उतारा जाए। भागवत ने कहा कि आध्यात्मिकता भारत की आत्मा है, जो व्यक्ति को स्वयं से जोड़ने के साथ-साथ समाज और संपूर्ण विश्व से एकात्मता का भाव पैदा करती है। जब व्यक्ति अपने आचरण में इस एकात्मता को उतारता है, तभी समाज में संतुलन और शांति स्थापित होती है।मर्यादा महोत्सव के अवसर पर उन्होंने जैन दर्शन और आचार्य महाश्रमण के संदेशों की सराहना करते हुए कहा कि अहिंसा, संयम और तप जैसे सिद्धांत आज के समय में और अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान युग में भौतिक प्रगति के साथ-साथ नैतिक और आध्यात्मिक विकास की भी उतनी ही आवश्यकता है, अन्यथा समाज असंतुलन की ओर बढ़ता है। भारत का अनुभव और उसकी जीवन दृष्टि इस संतुलन को स्थापित करने में विश्व का मार्गदर्शन कर सकती है।भागवत ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि मर्यादा केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर भी उसे अपनाना आवश्यक है। जब समाज के हर वर्ग में मर्यादा का भाव मजबूत होगा, तभी राष्ट्र सशक्त बनेगा और विश्व में उसका सम्मान बढ़ेगा। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे केवल ज्ञान अर्जित करने तक सीमित न रहें, बल्कि अपने चरित्र और आचरण को भी उतना ही सुदृढ़ बनाएं।कार्यक्रम में संतों की वाणी को शांति और आत्मचिंतन का स्रोत बताते हुए कहा गया कि ऐसे आयोजन समाज को सही दिशा देने का कार्य करते हैं। मर्यादा महोत्सव के माध्यम से संयम, सदाचार और आत्मानुशासन का संदेश पूरे समाज तक पहुंचा। इस अवसर पर बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु, संत और गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
भारतीय परंपरा में आध्यात्मिकता का स्थान
समाज के नैतिक मूल्यों पर बात करते हुए भागवत ने कहा कि भारत में लोग हमेशा से आध्यात्मिक व्यक्तित्वों का अनुसरण करते आए हैं. उन्होंने कहा कि केवल पैसे के पीछे भागना कभी भी हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं रहा है. यद्यपि वर्तमान समय में कुछ लोग आचरण में गिरावट की बात करते हैं, लेकिन इसके बावजूद भारतीय समाज में दान और परोपकार की भावना आज भी मजबूती से रची-बसी है। यही वह गुण है जो भारतीय समाज को विश्व के अन्य समाजों से अलग पहचान दिलाता है.















