जब किसी परिवार में यह खबर आती है कि घर में नई जिंदगी आने वाली है, तो खुशी का माहौल बन जाता है। लेकिन साथ ही यह दुआ भी की जाती है कि पूरे नौ महीने अच्छे से निकल जाएं और मां और बच्चा दोनों स्वस्थ रहें। गांवों में अक्सर बुजुर्ग महिलाएं गर्भवती महिला को सलाह देती हैं कि शुरुआती महीनों में प्रेग्नेंसी की बात किसी से साझा न करें, ताकि नजर न लगे और बच्चा सुरक्षित रहे। हालांकि, नजर लगने जैसी बातें सामाजिक मान्यताओं से जुड़ी होती हैं, लेकिन मिसकैरिज यानी गर्भपात का असल कारण कई बार मेडिकल और पर्यावरणीय स्थितियां होती हैं। मिसकैरिज एक बेहद दर्दनाक अनुभव है जिसमें गर्भ ठहरने के बाद बच्चा मां के गर्भ में ही अपने आप गिर जाता है। मां और परिवार के लिए यह गहरा सदमा होता है।
दुनिया में कितने मिसकैरिज होते हैं
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, हर साल पूरी दुनिया में करीब 2.3 करोड़ मिसकैरिज होते हैं। इसका मतलब है कि हर मिनट लगभग 44 महिलाएं इस स्थिति से गुजरती हैं। रिपोर्ट बताती है कि सभी प्रेग्नेंसी में मिसकैरिज का औसत खतरा करीब 15.3% होता है। वहीं, जीवन में एक बार मिसकैरिज का सामना करने वाली महिलाओं की संख्या 10.8% है। दो बार मिसकैरिज झेल चुकी महिलाओं की संख्या 1.9% और तीन या उससे ज्यादा बार गर्भपात का सामना करने वाली महिलाओं की संख्या 0.7% है। इन आंकड़ों से साफ है कि यह समस्या कितनी व्यापक है और लाखों महिलाओं की जिंदगी को प्रभावित कर रही है।
मिसकैरिज के कारण
गर्भपात के पीछे कई कारण हो सकते हैं। महिलाओं का स्वास्थ्य, शरीर में हार्मोनल असंतुलन, गर्भाशय से जुड़ी समस्याएं, तनाव, पर्याप्त पोषण न मिलना और गर्भावस्था के दौरान खराब जीवनशैली इसके बड़े कारण बनते हैं। इसके अलावा बढ़ती उम्र की महिलाओं में भी मिसकैरिज का खतरा अधिक होता है। वहीं, हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक और बड़े कारण की तरफ इशारा किया है और वह है केमिकल का असर।
केमिकल का बढ़ता खतरा
आज की लाइफस्टाइल में हम तरह-तरह के केमिकल्स के संपर्क में रहते हैं। द गार्जन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, नई रिसर्च में पाया गया है कि PFAS नामक जहरीले केमिकल्स महिलाओं में मिसकैरिज का बड़ा कारण बन सकते हैं। इन केमिकल्स को “फॉरएवर केमिकल्स” कहा जाता है क्योंकि ये वातावरण और शरीर में लंबे समय तक बने रहते हैं और खत्म नहीं होते। चीन में लगभग 200 महिलाओं पर की गई एक स्टडी में यह पाया गया कि जिन महिलाओं का बार-बार मिसकैरिज हुआ था, उनके खून में PFAS का स्तर ज्यादा था। इसका मतलब है कि इन जहरीले पदार्थों के संपर्क में आने से गर्भपात का खतरा बढ़ जाता है।
PFAS क्या हैं और क्यों खतरनाक हैं
PFAS यानी पर- और पॉलीफ्लुओरोएल्काइल सब्सटेंसेस का इस्तेमाल कई रोजमर्रा की चीजों में किया जाता है जैसे नॉन-स्टिक कुकवेयर, पैकेजिंग, कपड़े, सौंदर्य प्रसाधन और यहां तक कि कुछ पानी की बोतलों में भी। इनका सबसे बड़ा खतरा यह है कि ये शरीर में घुसने के बाद बहुत लंबे समय तक मौजूद रहते हैं और धीरे-धीरे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं। इनसे हार्मोनल बदलाव, इम्यून सिस्टम कमजोर होना और गर्भ में पल रहे शिशु पर बुरा असर पड़ सकता है।
समस्या से बचाव की जरूरत
मिसकैरिज के दर्द को समझना आसान नहीं है। यह मां और पूरे परिवार के लिए भावनात्मक रूप से बहुत कठिन समय होता है। ऐसे में जरूरी है कि महिलाएं प्रेग्नेंसी के दौरान सही पोषण लें, तनाव से दूर रहें और नियमित स्वास्थ्य जांच करवाती रहें। साथ ही, सरकार और स्वास्थ्य संस्थानों को PFAS जैसे खतरनाक केमिकल्स के उपयोग पर नियंत्रण लगाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। लोगों को भी यह जागरूकता होनी चाहिए कि वे किस तरह की चीजों का इस्तेमाल कर रहे हैं और उनमें कौन-से हानिकारक केमिकल शामिल हैं।
इस तरह, मिसकैरिज केवल नजर लगने जैसी मान्यताओं का नतीजा नहीं है, बल्कि कई बार इसके पीछे आधुनिक जीवनशैली और जहरीले केमिकल्स का बढ़ता खतरा भी जिम्मेदार होता है। समय रहते इस खतरे को पहचानकर उससे बचने के उपाय करना ही महिलाओं और बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए सबसे अहम है।















