मुजफ्फरनगर। हिंदी दिवस के अवसर पर अग्रणी साहित्यिक संस्था वाणी की विशेष गोष्ठी शाकुन्तलम में संपन्न हुई। इस गोष्ठी का आयोजन सुनीता मलिक सोलंकी के आवास पर किया गया, जिसमें हिंदी साहित्य और भाषा के प्रचार–प्रसार पर गहन विचार विमर्श किया गया। गोष्ठी की अध्यक्षता रामकुमार शर्मा रागी ने की जबकि संचालन सुनील कुमार शर्मा ने किया।इस अवसर पर सुनीता मलिक सोलंकी के नवीन कविता संग्रह “शाम का तारा” का लोकार्पण भी किया गया। गोष्ठी में हिंदी की वर्तमान दिशा और दशा पर चर्चा की गई और उपस्थित साहित्यकारों ने हिंदी के उत्थान के लिए शासन स्तर से अतिरिक्त प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया। योगेन्द्र सोम ने इस दिशा में विशेष प्रयास की आवश्यकता बताते हुए कहा कि हिंदी को और अधिक मजबूती से देश–विदेश में प्रचारित किया जाना चाहिए। बृजराज सिंह ने महर्षि दयानंद सरस्वती द्वारा हिंदी के प्रचार–प्रसार में किए गए योगदान को याद किया।कार्यक्रम में रचना पाठ का भी आयोजन हुआ। निशु भारद्वाज ने कहा, “हिंदी है अभिमान हमारा, संस्कृति की पहचान है। मां की बोली प्यारी हिंदी, यह भारत की शान है।” सुधीर जगधर ने अपनी कविता में नवरस और प्रकृति की महिमा का चित्रण किया। अंजली उत्तरेजा गुप्ता ने हिंदी के प्रति अपनी प्रीतिभावना व्यक्त की। सुनीता मलिक सोलंकी ने हिंदी के गीतों के माध्यम से सभी को जुड़ने का आह्वान किया। रामकुमार शर्मा रागी ने हिंदी को जननी बताते हुए इसे भाषा और संस्कृति का संगम बताया।राजीव भावग्य ने कहा कि हिंदी की सार्वभौमिकता और प्रेम सभी के लिए प्रेरणास्त्रोत है। सपना अग्रवाल ने हिंदी को भारत की भाषा और गौरव बताया। कर्मवीर सिंह ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज पढ़ने–लिखने के साथ हिंदी की मूल भावना को भी भूलते जा रहे हैं। विजया गुप्ता ने गुप्त और प्रसाद जैसे साहित्यकारों की कृति से हिंदी साहित्य की समृद्धि को दर्शाया। सुनील कुमार शर्मा ने हिंदी की गहराई और ऊंचाई पर प्रकाश डाला। पुष्पा रानी ने हिंदी को हर दिल की धड़कन और हिंदुस्तान की पहचान बताया।गोष्ठी में डॉ. के डी कौशिक ने मरहूम शायर मौजूदद्दीन बावरा पर मार्मिक संस्मरण प्रस्तुत किए, जिन्होंने वाणी संस्था में सक्रिय योगदान दिया। उनके संस्मरण ने सभी को भावविभोर कर दिया और साहित्यिक साधना की प्रेरणा दी।निष्कर्ष रूप में हिंदी दिवस के इस अवसर पर वाणी संस्था का यह कार्यक्रम यादगार रहा। साहित्य और संस्कृति के प्रति उपस्थित सभी सदस्यों की गहरी प्रतिबद्धता और हिंदी प्रेम ने गोष्ठी को विशेष और सार्थक बना दिया। इस आयोजन ने हिंदी भाषा की गरिमा और साहित्यिक समृद्धि को एक नई दिशा देने का कार्य किया।















