नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को आवारा कुत्तों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी की ओर से कोर्ट के आदेशों पर की गई टिप्पणी को लेकर नाराजगी जाहिर की। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उक्त टिप्पणी तकनीकी रूप से “अवमानना” की श्रेणी में आती है, लेकिन न्यायालय ने अपनी उदारता दिखाते हुए इस पर आगे कोई कार्रवाई नहीं करने का निर्णय लिया। यह मामला जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया था।सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों के मुद्दे पर लगातार पांचवें दिन सुनवाई मंगलवार को पूरी हुई। इस दौरान याचिकाकर्ताओं और विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों की दलीलें पूरी कर ली गईं। अदालत ने इस विषय को गंभीर सामाजिक समस्या बताते हुए कहा कि इससे जुड़े सभी पक्षों की बात सुनी जानी आवश्यक है ताकि संतुलित और व्यावहारिक समाधान निकाला जा सके। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मानव सुरक्षा, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा, के साथ-साथ पशु कल्याण के पहलुओं को भी समान रूप से ध्यान में रखना जरूरी है।सुनवाई के दौरान अदालत ने एमिकस क्यूरी गौरव अग्रवाल से प्रगति के बारे में जानकारी ली और पूछा कि क्या उनका नोट तैयार हो गया है। इस पर एमिकस क्यूरी ने बताया कि अभी सात राज्यों से संबंधित जानकारी शेष है, जिस पर काम जारी है। अदालत ने संकेत दिया कि अगली सुनवाई में इन सभी पहलुओं पर विस्तृत चर्चा की जाएगी।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई 28 जनवरी को दोपहर 2 बजे होगी। उस दिन सुप्रीम कोर्ट राज्यों की दलीलें, एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) का पक्ष सुनेगा। न्यायालय का उद्देश्य है कि इस जटिल मुद्दे पर सभी संबंधित पक्षों को पर्याप्त अवसर दिया जाए, ताकि कोई भी निर्णय व्यापक तथ्यों और संतुलित दृष्टिकोण के आधार पर लिया जा सके।गौरतलब है कि देश के कई हिस्सों में आवारा कुत्तों से जुड़े हमलों और सुरक्षा संबंधी घटनाओं को लेकर चिंता बढ़ी है। इसी पृष्ठभूमि में यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। कोर्ट पहले भी यह कह चुका है कि स्थानीय प्रशासन, नगर निकायों और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे कानून के तहत प्रभावी कदम उठाएं और ऐसी नीति बनाएं जिससे मानव जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके और पशुओं के साथ अमानवीय व्यवहार भी न हो।मंगलवार की सुनवाई के साथ ही कोर्ट ने यह संकेत दिया कि मामले में अंतिम दिशा-निर्देश देने से पहले वह सभी राज्यों और संवैधानिक संस्थाओं के विचार जानना चाहता है। अब 28 जनवरी की सुनवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं, जहां से इस मुद्दे पर आगे की दिशा तय होने की उम्मीद है।
मेनका गांधी के बयान पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी
मेनका गांधी की ओर से पेश वकील राजू रामचंद्रन ने कहा कि मेरी मुवक्किल कई वर्षों तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री रह चुकी हैं. इस पर जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि कुछ देर पहले आप कह रहे थे कि अदालत को सतर्क रहना चाहिए.क्या आपने पता लगाया कि वह किस तरह के बयान दे रही हैं?रामचंद्रन ने कहा कि बिल्कुल, अगर मैं अजमल कसाब के लिए पेश हो सकता हूं, तो उनके लिए भी पेश हो सकता हूं. इस पर जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि आपकी मुवक्किल ने अवमानना की है. हमने कोई कार्रवाई नहीं की है, यही हमारी उदारता है. आप देखिए वह क्या कहती हैं, उनकी बॉडी लैंग्वेज.
टिप्पणी व्यंग्यपूर्ण नहीं, हम गंभीर थे
रामचंद्रन ने कहा कि सार्वजनिक टिप्पणियों के मामले में वकीलों और जजों का दृष्टिकोण अलग-अलग होता है, मुझे आवेदनों पर बोलने दीजिए. वकील राजू रामचंद्रन ने समस्या के समाधान के लिए सुझाव दिए और कहा कि एबीसी नियमों का कार्यान्वयन समग्र रणनीति का अभिन्न अंग है. एनएपीआरई नीति ने रेबीज उन्मूलन में 9 बाधाओं की पहचान की हैइसमें सभी हितधारकों की भूमिका स्पष्ट रूप से बताई गई है और राज्यों को अपनी कार्य योजनाएं विकसित करने का निर्देश दिया गया है. 30 से अधिक राज्यों ने ऐसा नहीं किया है. समाधान स्थायी आश्रय स्थल बनाने में नहीं, बल्कि मौजूदा ढांचे के समयबद्ध कार्यान्वयन में निहित हैइस पर वकील प्रशांत भूषण ने आगे कहा कि कुत्तों का अल्ट्रासाउंड भी किया जा सकता है. जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि हम कुत्ते को प्रमाण पत्र ले जाने के लिए क्यों नहीं कह सकते? भूषण ने कहा कि मैं कहना चाहता हूं कि सुनवाई के दौरान जजों ने कुछ टिप्पणियां की हैं, जिनमें से कुछ का गलत अर्थ निकाला गया है, जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि कोई बात नहीं, तर्क अव्यावहारिक हैं.भूषण ने कहा कि कभी-कभी कोर्ट की टिप्पणियों के गंभीर परिणाम हो जाते हैं. जैसे मान लीजिए पीठ ने व्यंग्यपूर्वक टिप्पणी की कि दाना चुगली करने वालों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, इसकी रिपोर्ट प्रकाशित हुई. जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि नहीं नहीं, बिल्कुल भी व्यंग्यपूर्ण नहीं था. हम गंभीर थे, हमें नहीं पता कि हम क्या करेंगे, लेकिन हम गंभीर थे.
प्रशांत भूषण ने दिया ये तर्क
वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने कहा कि बार के सदस्य के रूप में मैं भी इस पर कुछ कहना चाहता हूं. कार्यवाही का टेलीविजन पर प्रसारण होता है. बार और पीठ दोनों का कर्तव्य है कि वे सतर्क रहें. जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि हम जानते हैं, इसे ध्यान में रखते हुए हम ऐसा करने से बच रहे हैं.वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि कुत्तों की प्रभावी नसबंदी सिर्फ कुछ ही शहरों में कारगर साबित हुई, दुर्भाग्य से यह प्रणाली अधिकांश शहरों में कारगर नहीं रही है. नसबंदी से समय के साथ आवारा कुत्तों की संख्या कम हो जाती है. इससे उनकी आक्रामकता भी कम होती है. इसे प्रभावी कैसे बनाया जाए? इसे पारदर्शी बनाएं और लोगों को जवाबदेह बनाएं. एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जहां लोग बिना नसबंदी वाले आवारा कुत्तों की रिपोर्ट कर सकें. शिकायत पर कार्रवाई के लिए नामित अधिकारी होने चाहिए. उन्हें आकर जांच करनी चाहिए और स्थिति का जायजा लेना चाहिए.















