उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने हाल ही में भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी में एक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की भागीदारी पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि हमारे जैसे लोकतांत्रिक देश में CJI कार्यकारी नियुक्तियों, विशेषकर CBI निदेशक के चयन में कैसे शामिल हो सकते हैं। धनखड़ ने इस प्रक्रिया पर पुनर्विचार की आवश्यकता पर जोर दिया, यह बताते हुए कि यह लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
धनखड़ का यह बयान ऐसे समय में आया है जब मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) की नियुक्ति के लिए समिति की बैठक होने वाली है। उन्होंने न्यायिक आदेशों के माध्यम से कार्यकारी शासन को ‘संवैधानिक विरोधाभास’ करार दिया, जिसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। उपराष्ट्रपति ने सभी संस्थानों से अपनी संवैधानिक सीमाओं के भीतर कार्य करने का आग्रह किया, ताकि लोकतंत्र में संतुलन और समन्वय बना रहे।
इससे पहले, 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI की तीन सदस्यीय समिति को मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की सिफारिश की थी। हालांकि, बाद में संसद द्वारा पारित कानून में CJI को इस समिति से बाहर रखा गया। धनखड़ ने इस संदर्भ में कहा कि न्यायपालिका की सार्वजनिक उपस्थिति मुख्यतः उनके निर्णयों के माध्यम से होनी चाहिए, और अन्य माध्यमों से अभिव्यक्ति संस्थागत गरिमा को कमजोर कर सकती है।उपराष्ट्रपति के इन बयानों ने कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों के संतुलन और सीमाओं पर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है, जो देश की लोकतांत्रिक संरचना के लिए महत्वपूर्ण है।















