पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष निरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया इन दिनों गंभीर विवादों में घिर गई है। चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन करने के उद्देश्य से शुरू की गई इस कवायद पर अब मानवीय संवेदनाओं की अनदेखी, प्रशासनिक संवेदनहीनता और संवैधानिक मूल्यों के उल्लंघन के आरोप लग रहे हैं। हालिया घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या तकनीकी और कागजी प्रक्रियाएं आम नागरिकों की मानसिक और सामाजिक स्थिति को समझे बिना लागू की जा रही हैं।
बीते दो दिनों में पुरुलिया, हावड़ा और पूर्वी मेदिनीपुर जिलों से आई खबरों ने राज्य की राजनीति और प्रशासन दोनों को झकझोर दिया है। इन तीनों जिलों में अलग-अलग घटनाओं में तीन बुजुर्ग नागरिकों की मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि ये बुजुर्ग SIR प्रक्रिया के तहत मिले नोटिस, दस्तावेजों की मांग और सुनवाई के डर से गहरे मानसिक तनाव में थे। परिवारों का कहना है कि वर्षों से मतदान कर रहे लोगों से अचानक नागरिकता, पहचान और निवास से जुड़े सवाल पूछे गए, जिससे वे खुद को अपमानित और असहाय महसूस करने लगे।
पुरुलिया जिले में एक 70 वर्षीय व्यक्ति को मतदाता सूची से नाम हटने की चेतावनी वाला नोटिस मिला था। परिवार के अनुसार, नोटिस मिलने के बाद से वे लगातार परेशान रहने लगे और अधिकारियों के चक्कर काटते रहे। हावड़ा में एक बुजुर्ग महिला, जो लंबे समय से बीमार थीं, को सुनवाई के लिए बुलाया गया था। परिजनों का आरोप है कि सुनवाई की प्रक्रिया और संभावित नाम कटने के भय ने उनकी हालत और बिगाड़ दी। पूर्वी मेदिनीपुर में भी ऐसी ही एक घटना सामने आई, जहां एक वृद्ध व्यक्ति नोटिस मिलने के बाद से अवसाद में चले गए और कुछ ही दिनों में उनकी मौत हो गई।इन घटनाओं के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर तीखा हमला बोला है। आरोप लगाया जा रहा है कि SIR के नाम पर भय और भ्रम का माहौल बनाया जा रहा है, जिससे खास वर्गों के मतदाताओं को निशाना बनाया जा सके। सत्तारूढ़ दल ने भी मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है और कहा है कि किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया का उद्देश्य नागरिकों को परेशान करना नहीं होना चाहिए।
चुनाव आयोग की ओर से अभी तक इन मौतों को सीधे तौर पर SIR से जोड़ने से इनकार किया गया है, लेकिन बढ़ते दबाव के बीच आयोग की कार्यप्रणाली और दिशा-निर्देशों पर पुनर्विचार की मांग तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मतदाता सूची सुधार जरूरी है, लेकिन इसे मानवीय दृष्टिकोण, पारदर्शिता और संवैधानिक गरिमा के साथ लागू किया जाना चाहिए, ताकि लोकतंत्र को मजबूत करने की प्रक्रिया खुद नागरिकों के लिए पीड़ा का कारण न बन जाए।
तकनीकी खामी या प्रशासनिक लापरवाही
इन घटनाओं ने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा किया है कि क्या यह केवल तकनीकी खामी थी या फिर प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा. चुनाव आयोग ने 27 दिसंबर को अधिसूचना के जरिए कहा था कि करीब 1.3 लाख के करीब ऐसे मतदाता हैं, जिनका नाम साल 2002 के फिजिकल रिकॉर्ड में है लेकिन ऑनलाइन डेटाबेस में तकनीकी खराबी के चलते दिखाई नहीं दे रहा है. चुनाव आयोग ने कहा कि इसमें मिलने वाली गड़बड़ी में सुनवाई के लिए उपस्थित होने की जरूरत नहीं है. इसके बावजूद कई जिलों में बुजुर्गों को नोटिस भेजा गया, जिसने मतदाताओं के बीच दहशत का माहौल पैदा हो गया.
पीड़ित परिवारों की शिकायत और जवाबदेही की मांग
तीनों मामलों में पीड़ित परिवारों ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है और सीधे तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराया है. उनका आरोप है कि गलत और भय पैदा करने वाली प्रक्रिया के कारण उनके परिजनों की जान गई. परिजन इस मामले में FIR भी दर्ज कराना चाहते हैं लेकिन वो ऐसा नहीं कर पा रहा हैं.
इस पूरे मामले पर जवाब देते हुए एक अधिकारी ने बताया कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के खिलाफ कोई FIR दर्ज नहीं की जा सकती है. कानून के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त को इस तरह के काम की छूट रहती है. अधिकारी ने बताया कि सीईओ को भी ड्यूटी के दौरान किसी भी प्रकार के फैसले लेने और कार्यों के लिए आपराधिक अपराध के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है.
क्या कहता है 2023 का कानून ?
मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य आयुक्त (2023) अधिनियम के तहत मुख्य या फिर अन्य चुनाव आयुक्तों पर को उनके आधिकारिक कामकाज के दौरान लिए गए किसी भी तरह के निणर्य, कार्य कराने और दिए गए बयानों के लिए जिम्मेदार नहीं उठराया जा सकता है और न ही उनके ऊपर किसी तरह कार्रवाई की जा सकती है. उन्हें इसके लिए कानून से सुरक्षा मिली हुई है. इसके मुताबिक उनके खिलाफ न तो दीवानी और न ही फौजदारी मुकदमा किया जा सकता है. इसके अलावा, किसी आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना पद से हटाया नहीं जा सकता.
महाभियोग ही एकमात्र रास्ता है?
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त को अगर पद से हटाना है तो केवल सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह ही हटाया जा सकता है. इसका मतलब है कि उनके ऊपर किसी भी तरह का सीधा मुकदमा या एफआईआर दर्ज नहीं कराई जा सकती है. मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया संसद के जरिए ही संभव है. यही नहीं अन्य चुनाव आयुक्तों को राष्ट्रपति की ओर से हटाया जा सकते है लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त को तभी हटाया जा सकता है जब संसद दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करें और राष्ट्रपति अंतिम आदेश जारी करें.
हटाने की प्रक्रिया क्या है?
- मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद का कोई भी सदस्य आरोपों के साथ प्रस्ताव ला सकता है.
- लोकसभा स्पीकर या राज्यसभा के सभापति आरोपों की गंभीरता देखकर तीन जजों की जांच समिति बनाते हैं.
- अगर जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो प्रस्ताव संसद में रखा जाता है.
- इसे पारित कराने के लिए लोकसभा और राज्यसभा, दोनों में कुल बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है
- इसके बाद राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का आदेश दे सकते हैं.
किन कारणों से हटाया जा सकता है मुख्य चुनाव आयुक्त?
मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल दो आधारों पर हटाया जा सकता है. पहला आधार दुर्व्यवहार, भ्रष्टाचार, पक्षपात, संवैधानिक जिम्मेदारियों का उल्लंघन या किसी राजनीतिक दल से मिलीभगत है. दूसरा आधार असमर्थता (इनकैपेसिटी) है, जैसे गंभीर शारीरिक या मानसिक बीमारी के कारण काम करने की क्षमता खत्म हो जाना. केवल विचारधारा में मतभेद या किसी फैसले से असहमति के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाया नहीं जा सकता.















