राजगढ़ में 171 वर्षों से जारी है भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा, पुरी की परंपरा का जीवंत स्वरूप

अलवर जिले की राजगढ़ तहसील में स्थित भगवान श्री जगन्नाथ जी महाराज का मंदिर, जगन्नाथ पुरी की तर्ज पर निर्मित है, जहां वर्षभर में 13 प्रमुख पर्व पारंपरिक विधि-विधान से मनाए जाते हैं। इन सभी में सबसे प्रमुख महाप्रभु श्री जगन्नाथ की पावन रथ यात्रा है, जो हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को निकाली जाती है। यह रथ यात्रा सत्य सनातन धर्म का प्रतीक मानी जाती है। आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक चलने वाले जगन्नाथ महोत्सव की शुरुआत ज्येष्ठ पूर्णिमा को होती है, जब भगवान का पंचामृत व 108 कलशों से अभिषेक किया जाता है और उनका गणेश रूप में श्रृंगार कर भक्ति भाव से दर्शन किए जाते हैं।

मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान जगन्नाथ का प्राकट्य हुआ था और वे अपने भ्राता बलभद्र व बहन सुभद्रा के साथ स्नान करते हैं, जिससे उन्हें ज्वर होता है और फिर उन्हें गर्भगृह में विश्राम के लिए ले जाया जाता है। राजगढ़ में यह परंपरा पिछले 171 वर्षों से महंत परिवार की नौ पीढ़ियों द्वारा निभाई जा रही है।

राजगढ़ में भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का प्रारंभ महंत केशव जी महाराज ने वर्ष 1855 में किया था। उन्होंने अलवर राज्य के पांचों प्रमुख महाजन, पटेल व चौधरी समुदायों को एकत्र कर यह परंपरा शुरू की थी। विवाह के अवसर पर एक रुपया भगवान को समर्पित करने की परंपरा भी उसी समय शुरू हुई। तत्कालीन अलवर नरेश शिवदान सिंह महाराज इस आयोजन से अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने इसे राज्य स्तर पर मान्यता दिलाई। प्रारंभ में रथ यात्रा चोपड़ा बाजार से होकर कुंड की परिक्रमा कर गोविंद देवजी मंदिर मार्ग से लौटती थी, लेकिन बाद में यह यात्रा गंगाबाग स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर तक विस्तारित हो गई। रथ यात्रा में हाथी, घोड़े, पलटन व राजकीय बैंड शामिल होते हैं, जो इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गरिमा को बढ़ाते हैं।

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