जवाहरलाल नेहरू भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और आधुनिक भारत निर्माण के प्रमुख स्तंभ रहे, लेकिन उनके जीवन की कहानी गौरव और पीड़ा दोनों का अनोखा मिश्रण है। एक समृद्ध और संस्कारी परिवार में जन्म लेने के बावजूद नेहरू का बचपन और युवावस्था कठोर अनुशासन और सख्त निगरानी के घेरे में बीती। स्वतंत्रता संग्राम में कूदने पर उन पर गांधी के अनुशासन की परछाईं और भी मजबूत हो गई। 57 वर्ष की उम्र में देश के पहले प्रधानमंत्री बने, परंतु पार्टी की अंतर्कलह और बाहरी राजनीतिक हमलों ने उन्हें लगातार आलोचनाओं से घेर रखा। इसके विपरीत जनता से मिला प्यार अद्भुत था। उनकी मृत्यु पर देश भर में शोक लहर दौड़ गई। मद्रास में एक महिला ने आत्मदाह किया और दिल्ली से प्रयागराज तक उनकी अस्थियों के अंतिम सफर में लाखों लोग रोते हुए उमड़ पड़े।
आज नेहरू को लेकर राजनीतिक स्वर बदले हुए हैं। एक ओर जहां उनके विचारों और नीतियों पर टिप्पणी की जाती है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग उन्हें मानव से ऊपर उठाकर प्रस्तुत करते हैं। हालांकि नेहरू को न देवता बनाया जा सकता है, न दानव। वे एक व्यावहारिक नेता थे जिन्होंने स्वतंत्र भारत को एकजुट रखने की कोशिश की। आजादी के समय देश रक्तरंजित था, हिंदू-मुस्लिम संबंधों में दरारें गहरी थीं, जातिगत विभाजन चरम पर था। ऐसे में गांधी की हत्या के बाद देश को संभालने की जिम्मेदारी नेहरू पर आ गई। उनकी नीतियां उस सांप्रदायिक तनाव वाले दौर में संतुलन स्थापित करने का प्रयास थीं।
कश्मीर का विलय उस दौर का सबसे जटिल राजनीतिक प्रश्न था। महाराजा हरि सिंह की अनिर्णय की स्थिति और पाक समर्थित कबायली हमले ने हालात बिगाड़ दिए थे। विलय पत्र पर हस्ताक्षर होने तक कश्मीर का बड़ा हिस्सा हाथ से निकल चुका था। इस संकट में नेहरू की उदार नीति और पटेल की कठोरता दोनों ने मिलकर समाधान का रास्ता बनाया। विदेश नीति में नेहरू की निर्गुट आंदोलन की सोच ने भारत को शीत युद्ध के दोनों खेमों से दूरी बनाए रखने का रास्ता दिया। मार्शल टीटो, गमाल अब्दुल नासिर और सुकर्णो के साथ उन्होंने NAM की नींव रखी, जिसने भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा बढ़ाई।
नेहरू आर्थिक दृष्टि से समाजवादी थे, लेकिन राजनीतिक रूप से उदारवादी। उन्होंने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को आगे बढ़ाया। श्रमिकों के हित में ESIC, कर्मचारी भविष्य निधि जैसी व्यवस्थाओं ने भारत की औद्योगिक संरचना को नई दिशा दी। हालांकि 1962 के चीन युद्ध में मिली हार और कुछ कूटनीतिक निर्णयों पर उन्हें खूब आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।
निजी जीवन में नेहरू बेहद अकेले थे। पत्नी कमला की असामयिक मृत्यु और जेल यात्राओं के बीच उनका पारिवारिक जीवन टूटा-फूटा रहा। एडविना माउंटबेटन के साथ उनके संबंधों को लेकर राजनीतिक हमले हुए, जबकि यह रिश्ता आत्मिक और बौद्धिक अधिक था। इसके बावजूद उन्होंने सभी आलोचनाओं के बीच देश को केंद्र में रखकर कार्य किया।
नेहरू को लेकर किसी भी चरम की सोच उचित नहीं। वे न तो सर्वगुण संपन्न देवपुरुष थे, न ही आज के राजनीतिक विमर्श में गढ़ा गया खलनायक। वे एक मानवीय नेता थे, जिनकी दूरदर्शिता और गलतियां—दोनों ने भारत की दिशा तय की।















