बाँदा। शिक्षा अब मध्यम वर्ग के लिए बोझ होती दिख रही है।जनपद के प्राइवेट स्कूलों द्वारा महंगी किताबें बेचे जाने का विरोध सोशल मीडिया पर देखने को मिल रहा है।सवाल यह भी है कि प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली किताबे क्या सोने और चांदी से बनाई जाती है? आख़िर क्यो ज्यादा दामो में बेचकर अभिभावकों से ज्यादा पैसे लिये जाते हैं?किताबो के नाम पर यह सिर्फ एक खर्च नहीं बल्कि आर्थिक दबाव होता है? शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान देना है न कि महंगा बनाकर बोझ बढ़ाना?बाँदा जनपद के बेसिक शिक्षा अधिकारी भी लचर दिख रहे हैं न तो कोई आदेश और न ही कोई कार्यवाही दिख रही है। निजी स्कूलों पर किताबों की कीमतों में भारी लूट का आरोप अभिभावकों के द्वारा लगाया जा रहा है।नए शैक्षिक सत्र में बच्चों के अगली कक्षा में प्रवेश के साथ ही अभिभावकों को नई किताबें खरीदनी पड़ती हैं। प्राइवेट स्कूलों ने अपने निर्धारित बुक स्टोर तय कर दिए हैं, जहां से अभिभावकों को किताबें खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है।आमजनमानस की मांग है कि जिन किताबों की कीमत बाजार में कम है, वही किताबें स्कूलों द्वारा तय दुकानों पर कई गुना महंगे दामों में बेची जा रही हैं। 100 रुपये में मिलने वाली किताब को 300रु से अधिक मूल्य तक में बेचा जा रहा है, जिससे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।महंगाई के इस दौर में बच्चों की पढ़ाई कराना पहले ही मुश्किल है,और स्कूलों की यह मनमानी स्थिति को और बिगाड़ रही है। जनपद के आमजनमानस की मांग है कि जिलाधिकारी जे0रिभा मामले की गंभीरता को समझते हुए जांच कर दोषी स्कूल व दुकानदारों पर सख्त कार्रवाई करे, ताकि शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो सके और अभिभावकों को राहत मिल सके।















