मुजफ्फरनगर आकांक्षा कॉलेज के शिक्षा विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. रणजीत सिंह ने कहा कि आज का युग विज्ञान, तकनीक और आधुनिकता का युग है, जहां शिक्षा का दायरा लगातार बढ़ रहा है। हर व्यक्ति शिक्षित बनने की चाह रखता है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि वर्तमान समय में शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री, नौकरी और धनार्जन तक सीमित होता जा रहा है। इसके कारण समाज में नैतिकता, शिष्टाचार और मानवीय मूल्यों का ह्रास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। आज अधिकांश विद्यार्थी अपना कीमती समय सोशल मीडिया पर अनावश्यक और गलत सामग्री देखकर बर्बाद कर रहे हैं, जिसके दुष्परिणाम समाज में देखने को मिल रहे हैं। ऐसे समय में यह आवश्यक हो जाता है कि शिक्षा के साथ संस्कारों का समावेश भी हो, क्योंकि बिना संस्कार के शिक्षा अधूरी और दिशाहीन होती है।
डॉ. सिंह ने कहा कि शिक्षा किसी भी समाज और राष्ट्र की आधारशिला है, जो व्यक्ति को अज्ञानता से निकालकर ज्ञान का मार्ग दिखाती है और उसे करियर में सफलता तथा आर्थिक स्थिरता प्रदान करती है। मगर केवल किताबी ज्ञान एक संपूर्ण मानव निर्माण में पर्याप्त नहीं है। संस्कार वे महत्त्वपूर्ण गुण हैं जो विद्यार्थी को अच्छा इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनाते हैं। संस्कार शिक्षा को उचित दिशा और उद्देश्य देते हैं, जिससे उसका प्रभाव व्यापक और सकारात्मक होता है।
उन्होंने बताया कि विद्यार्थी राष्ट्र की अमूल्य निधि हैं जो भविष्य में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ बनकर देश का नेतृत्व करेंगे। यदि ये भविष्य निर्माता केवल शिक्षित होकर रह जाएँ और उनमें संस्कारों का अभाव हो, तो राष्ट्र का विकास अधूरा रह जाएगा। इसलिए आधुनिक शिक्षा व्यवस्था को विद्यार्थियों के बौद्धिक विकास के साथ हृदय का पोषण करना भी आवश्यक है। शिक्षा जहाँ उन्हें सफल बनाती है, वहीं संस्कार उन्हें महान बनाते हैं। यही दोहरी शिक्षा एक चरित्रवान, कुशल और जिम्मेदार युवा पीढ़ी का निर्माण कर सकती है।
डॉ. सिंह ने कहा कि संस्कार विद्यार्थियों को ईमानदारी, दया, सहानुभूति और बड़ों के सम्मान जैसे गुण सिखाते हैं। इनके अभाव में शिक्षित व्यक्ति भी स्वार्थी और अनैतिक निर्णय ले सकता है, जैसा कि आधुनिक भौतिकवादी समाज में अक्सर देखने को मिलता है। इसीलिए कहा जाता है कि केवल शिक्षा व्यक्ति को सफल बनाती है, लेकिन संस्कार उसे सम्मान दिलाते हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि विद्यार्थियों के जीवन में शिक्षा और संस्कार दोनों का समान रूप से विकास होना अत्यंत आवश्यक है। यदि समाज और राष्ट्र को उज्ज्वल भविष्य की ओर अग्रसर करना है, तो नई पीढ़ी को संस्कारयुक्त शिक्षा देना होगी। संस्कारों के विकास में माता-पिता, परिवार, विद्यालय, शिक्षक और समाज सभी की सामूहिक जिम्मेदारी होती है। जब हर स्तर पर शिक्षा के साथ संस्कारों को महत्व दिया जाएगा, तभी देश की प्रगति का मार्ग प्रशस्त होगा।















