यूएन की 80वीं वर्षगांठ पर सुधार की बहस तेज, भारत ने निभाने की जताई बड़ी भूमिका

संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी स्थापना की 80वीं वर्षगांठ ऐसे समय मना रहा है, जब उसकी प्रासंगिकता और प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। एक ओर दुनिया युद्ध, जलवायु परिवर्तन, मानवीय संकट और वैश्विक अस्थिरता जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, वहीं दूसरी ओर यूएन इन मुद्दों पर ठोस और सख्त कार्रवाई करने में असफल नजर आ रहा है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय मंच पर यूएन की आलोचनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही संयुक्त राष्ट्र को नाकाम संस्था करार दे चुके हैं और इसकी भविष्य की भूमिका पर सवाल उठा चुके हैं।

इसी बीच भारत ने संयुक्त राष्ट्र में अपनी बड़ी और निर्णायक भूमिका निभाने की इच्छा स्पष्ट रूप से जाहिर की है। भारत का मानना है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों में यूएन की संरचना अब पुरानी हो चुकी है और यदि इसे प्रासंगिक बनाए रखना है तो व्यापक सुधार अनिवार्य हैं। भारत ने साफ कहा है कि जब तक सुरक्षा परिषद के स्थायी और अस्थायी सदस्यों की संख्या में बदलाव नहीं किया जाएगा, तब तक संयुक्त राष्ट्र में वास्तविक सुधार संभव नहीं है।

भारत का तर्क है कि वर्तमान सुरक्षा परिषद द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की वैश्विक वास्तविकताओं पर आधारित है, जबकि आज दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों को सुरक्षा परिषद में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है, जिससे यूएन के फैसलों पर असंतुलन का आरोप लगता रहा है। भारत लंबे समय से स्थायी सदस्यता की मांग करता आ रहा है और इसे वैश्विक शांति, विकास और जलवायु जैसे मुद्दों पर अपनी जिम्मेदारी निभाने के रूप में देखता है।

1945 में स्थापित संयुक्त राष्ट्र संघ का उद्देश्य वैश्विक शांति बनाए रखना था, लेकिन 80 साल बाद उसके ढांचे और निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं। ऐसे में भारत का यह रुख संकेत देता है कि आ

भारत की क्या है इच्छा?

सितंबर 2025 में यूनाइटेड नेशन में एक डिबेट में बोलते हुए भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा- जब संघर्षों से शांति खतरे में होती है, जब संसाधनों की कमी से विकास पटरी से उतर जाता है, जब आतंकवाद से मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है, तब संयुक्त राष्ट्र गतिरोध में फंसा रहता है. आम सहमति बनाने की इसकी क्षमता कम होने के साथ-साथ बहुपक्षवाद में विश्वास भी घटता जाता है.

विदेश मंत्री एस जयशंकर के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र संघ वर्तमान में संकट में हैं. इसे ठीक करने के लिए यूएन परिषद की स्थायी और अस्थायी दोनों सदस्यता का विस्तार किया जाना चाहिए. इस सुधार में भारत अपनी पूरी भूमिका निभाएगा.

इस भाषण में जयशंकर ने दुनियाभर में संकट के समय भारत की तरफ से किए गए कामों का उल्लेख भी किया. उन्होंने कहा अफगानिस्तान और म्यांमार के लोगों ने हाल के भूकंपों के दौरान भारत को मदद का हाथ बढ़ाते देखा. हमारे सैनिक अरब सागर में सुरक्षित व्यापार सुनिश्चित करते हैं.

5 स्थाई और 10 अस्थाई मेंबर

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 5 स्थाई और 10 अस्थाई सदस्य हैं. स्थाई सदस्यों की सूची में अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस का नाम शामिल हैं. अस्थाई सदस्यों का नाम समय-समय पर बदलता रहता है. हालांकि, अब रूस, फ्रांस जैसे कई स्थाई सदस्यों का कहना है कि इसमें बदलाव जरूरी है.

हाल ही में एक डिबेट में यूएन जनरल असेंबली की प्रेसिडेंट एनालेना बेरबॉक ने भारत को स्थाई मेंबर बनाने की पैरवी की. बेरबॉक का कहना था कि अगर भारत जैसे देशों को स्थाई सदस्यता मिलती है तो यूएन की विश्वसनीयता बढ़ सकती है.

ने वाले समय में यूएन सुधार को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति और भी तेज होने वाली है।

लाइव विडियो
विज्ञापन
क्रिकेट स्कोर
राशिफल
DELHI Weather
Recent Posts