सुप्रीम कोर्ट ने एक ईसाई आर्मी ऑफिसर की उस याचिका को सख्ती से खारिज कर दिया, जिसमें उसने सेना द्वारा की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को चुनौती दी थी। यह मामला उस समय सामने आया था जब अधिकारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारी के आदेश के बावजूद गुरुद्वारा जाने से इनकार कर दिया था। सेना में इस तरह की अवज्ञा को गंभीर अपराध माना जाता है, क्योंकि अनुशासन और आदेशों का पालन ही सैन्य व्यवस्था की नींव है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि सैनिक का धर्म कुछ भी हो, लेकिन यूनिट के कल्याण, भाईचारे और सैन्य परंपरा को निभाना उसकी पहली जिम्मेदारी है। इसलिए आदेश की अवहेलना करने वाले अधिकारी के लिए सेना में कोई स्थान नहीं बचता।
सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की कि सेना की सेवा सामान्य नौकरियों की तरह नहीं है, जहां व्यक्तिगत सुविधा या निजी विचारों को प्राथमिकता दी जाए। देश की सुरक्षा में लगे जवानों और अधिकारियों से अपेक्षा की जाती है कि वे बिना किसी पक्षपात, धार्मिक भेदभाव और व्यक्तिगत मतभेद के अपने कर्तव्यों का पालन करें। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सेना विभिन्न धर्मों, समुदायों और क्षेत्रों से आने वाले जवानों का संगठित समूह है, जहां परंपराओं और आदेशों का सम्मान करना अनिवार्य होता है। यदि कोई अधिकारी धार्मिक आधार पर किसी गतिविधि का विरोध करता है, तो इससे यूनिट की एकता और मनोबल पर सीधा असर पड़ता है।
कोर्ट ने संबंधित अधिकारी की दलीलों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि आदेश का उद्देश्य किसी धर्म का प्रचार नहीं था, बल्कि यह रेजिमेंट की सामूहिक परंपरा और परस्पर सम्मान का हिस्सा था। अधिकारी का यह कहना कि यह उसकी धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है, अदालत ने अस्वीकार कर दिया और कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ सैन्य अनुशासन से ऊपर उठ जाना नहीं हो सकता। सेना की परंपराओं में अन्य धर्मस्थलों पर जाना किसी अनिवार्य धार्मिक अनुष्ठान की तरह नहीं, बल्कि सभी धर्मों के प्रति सम्मान और सामूहिक भावना का प्रतीक माना जाता है।
अदालत ने अंत में कहा कि आदेश की अवहेलना करने वाला अधिकारी सेना जैसी अनुशासित संस्था में रहने योग्य नहीं है। इसलिए उसकी बहाली या सजा को रद्द करने की मांग किसी भी आधार पर स्वीकार नहीं की जा सकती। फैसले में स्पष्ट किया गया कि सेना में अनुशासन सर्वोपरि है और इसे कमजोर करने वाली हर हरकत को शून्य सहनशीलता की नीति से देखा जाएगा।















