अलवर के मालाखेड़ा क्षेत्र में भीषण गर्मी के बीच गरीब मजदूर दो वक्त की रोटी के लिए खारेड़ा जोहड़ की खुदाई में लगे हुए हैं। प्रदेश में आसमान से आग बरस रही है और तापमान लगातार 45 डिग्री सेल्सियस के पार बना हुआ है, वहीं ये मजदूर जलती ज़मीन पर कंक्रीट और पथरीली मिट्टी को तोड़ने का कठिन काम कर रहे हैं। हालत इतनी खराब है कि मजदूरों के हाथों में छाले पड़ गए हैं, और फावड़े के बजाय भारी गेति से खुदाई करनी पड़ रही है।इस कठिन परिश्रम के बावजूद मजदूरी घटकर 281 रुपए से मात्र 196 रुपए रह गई है। यह काम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत किया जा रहा है। मजदूरी टास्क बेस पर दी जा रही है और मिट्टी की प्रकृति के अनुसार मजदूरी 196 रुपए से लेकर 253 रुपए तक तय की जा रही है। मजदूरों ने बताया कि खुदाई के लिए पहले पानी का छिड़काव करना पड़ता है, तब जाकर मिट्टी कुछ हद तक नरम होती है।
सहायक अभियंता गोविंद सिंह ने मीडिया को बताया कि सामान्य मिट्टी और कंक्रीट पथरीली मिट्टी की खुदाई में अंतर होता है, और इसी आधार पर मजदूरी तय की जाती है। उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि मजदूरों के साथ किसी प्रकार का अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।
हालांकि, ज़मीनी हकीकत यह है कि मजदूरी न केवल कम दी जा रही है, बल्कि पिछले दो महीनों से मालाखेड़ा पंचायत समिति के अधीन चल रहे कार्यों का भुगतान भी नहीं हुआ है, जिससे मजदूरों के सामने भुखमरी जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है।सरकार द्वारा काम का समय सुबह 6 बजे से दोपहर 1 बजे तक रखा गया है, लेकिन तापमान और मौसम की भीषणता को देखते हुए यह राहत नाकाफी साबित हो रही है। सवाल यह है कि क्या सरकार और प्रशासन को तब ही जागना होगा, जब कोई हादसा हो जाए? यह वक्त है कि मनरेगा जैसी योजनाओं में कार्यरत मजदूरों की हालत सुधारी जाए, समय पर भुगतान सुनिश्चित किया जाए, और उनकी मेहनत के साथ न्याय किया जाए।















