मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत में दो बार सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों को नजरअंदाज किया गया, क्योंकि उस समय नियुक्ति का अंतिम अधिकार सरकार के पास था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि नेहरू सरकार ने मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में मनमानी की थी। न्यायमूर्ति गवई ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लोकतंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक बताया और कार्यपालिका की अत्यधिक भूमिका पर सवाल उठाते हुए जजों के चयन में पारदर्शिता और निष्पक्षता की आवश्यकता पर बल दिया। उनका यह बयान न्यायिक स्वायत्तता को लेकर चल रही बहस को और तेज कर सकता है।















