नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (नालसा) ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल कर बुजुर्ग और गंभीर रूप से बीमार कैदियों की दयापूर्ण रिहाई की मांग की है। याचिका में तर्क दिया गया है कि इन कैदियों को जेल में रखना उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन है और यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का भी हनन करता है। नालसा का कहना है कि इन कैदियों की खराब स्वास्थ्य स्थिति और उम्र को देखते हुए उन्हें मानवीय आधार पर रिहा किया जाना चाहिए। अदालत से अपील की गई है कि वह इस विषय में एक समान नीति बनाने का निर्देश दे।
मानवाधिकारों सिद्धांतों का भी उल्लंघन करता है
याचिका में तर्क दिया गया है कि ऐसे व्यक्तियों को लगातार कैद में रखना, जिनमें से कई लोगों के पास सही तरीके से डॉक्टरों की देखभाल, दवाइयां तक पहुंच नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत उनके अधिकारों के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार सिद्धांतों का उल्लंघन करता है.
जनहित याचिका में नालसा के बुजुर्ग कैदियों और असाध्य रूप से बीमार कैदियों के लिए विशेष अभियान का समर्थन किया गया है, जिसे 10 दिसंबर, 2024 (मानवाधिकार दिवस) को न्यायमूर्ति बीआर गवई के मार्गदर्शन में शुरू किया गया था, जो नालसा के कार्यकारी अध्यक्ष हैं.
अभियान का उद्देश्य ऐसे कैदियों की पहचान करना, कानूनी सहायता के माध्यम से उनकी रिहाई की सुविधा प्रदान करना और समाज में उनके फिर से एकीकरण का समर्थन करना है.
NALSA क्या है?
राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA) का गठन कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत किया गया, जिसमें समाज के कमजोर वर्गों को फ्री में कानूनी सेवाएं प्रदान करने की बात कही गई है. साथ ही विवादों के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए लोक अदालतों का आयोजन करने के लिए भी NALSA का गठन किया गया है. हर जिले में, जिले में कानूनी सेवा कार्यक्रमों को लागू करने के लिए जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण का भी गठन किया गया है.















