पाकिस्तान की काउंसिल ऑफ इस्लामिक आइडियोलॉजी (CII) ने हाल ही में एक विवादास्पद फतवा जारी किया है, जिसमें वीपीएन (VPN) के इस्तेमाल को इस्लामी कानून (शरिया) के खिलाफ बताया गया है, खासकर जब इसका उपयोग इंटरनेट पर प्रतिबंधित सामग्री देखने के लिए किया जाता है। इस फैसले का उद्देश्य साइबर सुरक्षा को बढ़ावा देना और आतंकवाद से मुकाबला करना बताया गया है।
हालांकि, इस फतवे की व्यापक आलोचना हो रही है। कई लोग इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला और निगरानी को बढ़ावा देने वाला कदम बता रहे हैं। मशहूर मौलाना तारिक जमील ने भी इस फतवे पर आपत्ति जताते हुए इसे “संकीर्ण मानसिकता” का उदाहरण बताया। उन्होंने यह सवाल उठाया कि यदि VPN हराम है, तो मोबाइल फोन का इस्तेमाल भी हराम होना चाहिए, क्योंकि इसका भी उपयोग प्रतिबंधित सामग्री देखने के लिए किया जा सकता है।इस विवाद ने ऑनलाइन बहस को जन्म दिया है, जहां कई लोग इसे “मुल्लाह-मिलिट्री” गठजोड़ का नतीजा मान रहे हैं। लोगों का कहना है कि सेना और धार्मिक संस्थाएं मिलकर जनता पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं। आलोचकों ने इस कदम को गैर-जरूरी और ऑनलाइन स्वतंत्रता के लिए नुकसानदायक बताया है।















