महाराष्ट्र में बाहर से आए ऑटो, टैक्सी चालकों के लिए मराठी सीखना अनिवार्य कर दिया गया है. राज्य की सरकार ने लाइसेंस, परमिट के लिए बाकायदा मराठी के टेस्ट का भी ऐलान कर दिया है. अब इस मामले में खुद को मराठा अस्मिता का ठेकेदार कहने वाले राज ठाकरे की एंट्री हो गई है.ऑटो-टैक्सी चालकों के लिए राज ठाकरे ने तो बाकायदा मराठी कोचिंग सेंटर खोल दिया है. मुंबई से सटे मीरा भायंदर में स्थित MNS का कथित कोचिंग सेंटर है. जहां कई ऑटो और टैक्सी चालक जमीन पर बैठे हैं, वहीं सामने खड़ी हैं मराठी की शिक्षिका बाहर से आए लोगों को मराठी की क्लास दे रही हैं.
मराठी ज्ञान
मैडम बता रही हैं कि मराठी में हम को मी कहते हैं. तुम को तू कहते हैं. ‘आया’ बोलना हो तो मी आलो कहा जाता है. पहले मराठी की जानकारी दी जाती है और फिर ऑटो चालकों यानी मराठी के कथित छात्रों से इन शब्दों को दोहराने के लिए कहा जाता है. काम काज को छोड़कर इन गरीब ऑटो चालकों को मराठी की क्लास लेनी पड़ रही है. बात यही खत्म नहीं होती. जब क्लास पूरी हो जाती है तो कोचिंग में शामिल हर चालक के ऑटो पर एक पोस्टर भी लगाया जाता है. जिस पर लिखा होता है- मुझे मराठी आती है, मैं मराठी समझ सकता हूं.
ये प्रचार क्यों?
क्या इस पोस्टर के जरिए राज ठाकरे की पार्टी मराठी अस्मिता से जुड़ा पॉलिटिकल माइलेज लेना चाहती. या फिर इस पोस्टर का मकसद उन चालकों को चिन्हित करना है जो बाहर से आए हैं. अगर ऐसे पोस्टर लगेंगे तो सड़क पर चलते आदमी को पता चल जाएगा कौनसा ऑटो महाराष्ट्र के मूल निवासी का है. और वहां ऑटो को बाहर से आए ड्राइवर चला रहे हैं. राजनीति भी अजब चीज है. विपक्ष में बैठी एमएनएस सरकारी आदेश को प्रोत्साहन दे रही है और सरकार से जुड़े नेता भाषा के साथ ही साथ. ऑटो, टैक्सी चालकों के विकास पर जोर देने की मांग कर रहे हैं.
मराठी भाषा के प्रचार-प्रसार पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन यहां एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है. क्या वाकई सियासत में अब सिर्फ भाषा का ही मुद्दा रह गया है. जो खद्दरधारी मराठी अस्मिता का मुद्दा उठा रहे हैं. क्या उन्हें महाराष्ट्र में गरीबी और रोजगार जैसी समस्याएं नहीं नजर आतीं.
महाराष्ट्र में आज भी 65 लाख से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती है. राज्य में युवाओं की बेरोजगारी दर 13 प्रतिशत से भी ज्यादा है. 21वीं सदी में भी महाराष्ट्र के 1 करोड़ 64 लाख लोग अशिक्षित हैं और तो और आज भी महाराष्ट्र में 1 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. महाराष्ट्र में बहुत सी चुनौतियां हैं लेकिन वोटबैंक की राजनीति करने वालों को याद आते हैं तो सिर्फ बाहर से आए लोग और मराठी भाषा.
अब वोटबैंक की पॉलिटिक्स इंसान की नीयत और जज्बात दोनों पर हावी हो जाती है. ऐसे ही राजनीतिक बर्ताव को लेकर लिखा गया है. जब हम भाषा के आधार पर फर्क करते हैं, तो हम केवल शब्दों का अपमान नहीं करते, बल्कि उस व्यक्ति की पूरी विरासत और संस्कृति को ‘दोयम दर्जे’ का घोषित कर देते हैं.















