बाँदा: इमामबाड़ों में मजलिस-मातम का सिलसिला शुरू.

बाँदा।शहर के इमामबाड़ों और अज़ाखानों में गम-ए-हुसैन का माहौल छाया हुआ है। शाम होते ही शहर में मजलिस, मातम और नौहाख्वानी का सिलसिला शुरू हो जाता है। बड़ी तादाद में अकीदतमंदों ने हजरत इमाम हुसैन और शोहदाए कर्बला को याद कर अश्कों का नज़राना पेश किया। पूर्वी कोठी,में गाजीपुर से आए मौलाना सै0 हैदर करबलाई ने मिंबर से हक और इंसानियत के लिए इमाम हुसैन की कुर्बानी बयान की। अंजुमन अब्बासिया के शमसुल हसन रिजवी ने नौहा पढ़ा – ‘मरहबा, मरहबा ऐ हुसैन मरहबा’, सुनकर सबकी आंखें नम हो गईं।अनवरी बेगम कंपाउंड में रात में झाँसी से आए मौलाना सै0 फरमान अली आब्दी ने मासूमीन के फज़ाइल और कर्बला के मसाएब बयान किए। उन्होंने कहा, “हुसैन वो दर है जहाँ मजहब की कोई कैद नहीं। इमाम हुसैन ने जालिम के आगे सर नहीं झुकाया।औन अब्बास और शमसुल हसन ने नौहाख्वानी की।क्योटरा रेलवे क्रासिंग में मरहूम मिर्जा बाकर साहब दरोगा के इमामबाड़े में शमसुल हसन रिजवी ने मर्सियाख्वानी की। अहलेबैत के फज़ाइल सुनकर अकीदतमंदों ने वाहवाही की। बाद में औन अब्बास ने नौहा पढ़ा और मातमदारों ने सीनाजनी की।अली इमाम आब्दी, मिर्जा यावर हुसैन अधिवक्ता,अली अकबर, आगा अनसार,मजहर हुसैन, रजा मेंहदी, शोएब रिजवी, जफर रजा, शजरुल हसन, वसीम हैदर, शमीम हैदर, साजिद हुसैन, अहमद रजा, हैदर शिकोह अधिवक्ता समेत सैकड़ों अकीदतमंद शामिल हुए।कर्बला का पैगाम सब्र, कुर्बानी और इंसानियत का फिजाओं में गूंज रहा है। मजलिसों में उठने वाली ‘या हुसैन’ की सदा बता रही है कि हुसैनियत आज भी जिंदा है।

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