जमीयत उलेमा-ए-हिंद की कार्यसमिति की दो दिवसीय बैठक रविवार को संपन्न हुई, जिसमें संगठन के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने केंद्र और कई राज्य सरकारों की नीतियों पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि देश में नफरत की राजनीति अब डर और धमकी की राजनीति में बदल चुकी है, जिसका उद्देश्य मुसलमानों को भयभीत कर यह संदेश देना है कि उन्हें अब शर्तों पर जीवन जीना होगा। उन्होंने आरोप लगाया कि जो लोग सत्ता की विचारधारा से सहमत नहीं होंगे, उन्हें जेल या प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। मदनी ने कहा कि यह स्थिति संविधान और कानून की सर्वोच्चता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। उन्होंने पश्चिम बंगाल और असम विधानसभा चुनावों का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि चुनाव आचार संहिता की खुलेआम अनदेखी हुई और मुसलमानों को सार्वजनिक रूप से धमकियां दी गईं। उन्होंने कहा कि चुनाव के बाद भी कुछ नेताओं के बयान लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हैं।
मौलाना मदनी ने समान नागरिक संहिता, वंदे मातरम् को अनिवार्य किए जाने, मस्जिदों और मदरसों पर कार्रवाई जैसे मुद्दों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कई राज्यों में मदरसों और धार्मिक स्थलों को अवैध बताकर गिराया जा रहा है तथा मुस्लिम संस्थानों को संदेह की नजर से देखा जा रहा है। उन्होंने घोषणा की कि जमीयत जल्द केंद्रीय और प्रांतीय स्तर पर मदरसा बोर्ड गठित करेगी ताकि मदरसों की समस्याओं के समाधान के लिए सामूहिक प्रयास किए जा सकें।
उन्होंने स्पष्ट किया कि संगठन समान नागरिक संहिता और वंदे मातरम् को अनिवार्य बनाने के खिलाफ कानूनी लड़ाई जारी रखेगा। मदनी ने SIR और NRC जैसे मुद्दों पर भी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मतदाता सूचियों और परिसीमन की प्रक्रिया के जरिए मुस्लिम वोट को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने मुसलमानों से सभी जरूरी दस्तावेज तैयार रखने और सतर्क रहने की अपील की। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि मुसलमानों को अधिकार किसी सरकार ने नहीं बल्कि संविधान ने दिए हैं और वे किसी भी परिस्थिति में दूसरे दर्जे का नागरिक बनना स्वीकार नहीं करेंगे। अंत में उन्होंने देश की सभी न्यायप्रिय शक्तियों से भाईचारा, न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए एकजुट होने की अपील की।























































