मुजफ्फरनगर के पौराणिक तीर्थ स्थल शुकतीर्थ में चल रही नवदिवसीय रामकथा के छठे दिन प्रसिद्ध कथावाचक मोरारी बापू ने भागवत और रामचरितमानस के गूढ़ रहस्यों का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा के दौरान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी और पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण में डूबा नजर आया। बापू ने कहा कि भागवत की रचना के दस विभागों में “आश्रय” सबसे महत्वपूर्ण है और कलियुग के जीवों के लिए भगवान का आश्रय ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है।
मोरारी बापू ने आश्रय के नौ स्वरूपों का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि पहला “नामाश्रय” है। उन्होंने कहा कि कलियुग दोषों से भरा हुआ है, लेकिन भगवान के नाम स्मरण से ही मुक्ति संभव है। उन्होंने कहा कि नाम में ही ज्ञान और विज्ञान दोनों समाहित हैं। कथा के दौरान उन्होंने कहा कि जब मनुष्य के जीवन से शोक समाप्त होता है, तभी “शुक” प्रकट होता है। यदि शोक में श्लोक जुड़ जाए तो मनुष्य विज्ञान विशारद बन सकता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि जीवन में सब कुछ छूट जाए, लेकिन प्रभु का नाम कभी नहीं छूटना चाहिए।
दूसरे “अश्रु आश्रय” अथवा “जलाश्रय” का वर्णन करते हुए बापू ने कहा कि जो भक्त भगवान के गुणगान में भावविभोर होकर अश्रुधारा बहाता है, वही सच्चा भक्त कहलाता है। उन्होंने संत कबीरदास का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवत प्राप्ति के लिए सतत प्रयास आवश्यक है तथा साधु की जाति नहीं, बल्कि उसके ज्ञान और प्रकाश को देखना चाहिए। “थलाश्रय” की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि एकांत में स्थिर होकर बिना विचलित हुए भगवान का भजन करना ही सच्चा थलाश्रय है।
कथा में बापू ने रूपाश्रय, धामाश्रय, विवेकाश्रय, विरक्ति आश्रय और रति आश्रय का भी भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने कहा कि विवेक सत्संग से प्राप्त होता है और भगवान के चरणों में प्रेम रखने वाले भक्त का समाज में सदैव सम्मान होता है। सबसे श्रेष्ठ “कथाश्रय” को बताते हुए उन्होंने कहा कि राजा परीक्षित ने केवल कथा का आश्रय लेकर भगवान को प्राप्त किया था। कलियुग में भगवत कथा ही वह नौका है जो जीव को भवसागर से पार लगाने का सामर्थ्य रखती है।
कथा के उत्तरार्ध में जनकपुर की लीलाओं, राम-जानकी विवाह और चारों भाइयों के विवाह प्रसंग का अत्यंत मनोहारी वर्णन किया गया। पुष्पवाटिका प्रसंग सुनाते हुए बापू ने बताया कि माता सीता ने पहली बार भगवान राम को देखकर मन ही मन उन्हें अपना वर स्वीकार किया और माता गौरी से प्रार्थना की कि स्वयंवर का धनुष राम के हाथों में आते ही हल्का हो जाए। कथा के भावपूर्ण वर्णन से श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
इस अवसर पर भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत भी कथा में पहुंचे और पूरे समय श्रद्धाभाव से कथा श्रवण किया। कथा समापन पर उन्होंने व्यासपीठ को नमन कर आरती की। उन्होंने कहा कि शुकतीर्थ जैसे पवित्र और ऐतिहासिक स्थल पर मोरारी बापू के मुख से रामकथा सुनना सौभाग्य की बात है।























































