बिहार में चुनावी सरगर्मी बढ़ते ही राजनीतिक दलों के बीच ‘रोजा इफ्तार’ का आयोजन तेज हो गया है। विभिन्न पार्टियों के नेता रोजा खोलने की दावत देकर मुस्लिम समुदाय को लुभाने में जुटे हैं। बड़े होटल, कम्युनिटी हॉल से लेकर मस्जिदों और दरगाहों तक में भव्य इफ्तार पार्टियों का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें दिग्गज नेता से लेकर स्थानीय कार्यकर्ता तक बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। हालांकि, कुछ नेताओं ने इस राजनीतिक इफ्तार संस्कृति से दूरी बनाकर संकेत दिया है कि वे इसे वोट बैंक की राजनीति मानते हैं। दूसरी ओर, कई नेता इस आयोजन को सामाजिक समरसता और सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक बता रहे हैं। सवाल यह उठता है कि क्या यह पहल वास्तव में भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए है, या फिर यह केवल आगामी चुनावों में मुस्लिम मतदाताओं को अपने पक्ष में करने का एक राजनीतिक हथियार बन गया है?















