मुजफ्फरनगर। इतिहास की विरासत जब वर्तमान की चुनौतियों से टकराती है, तब समाज को दिशा देने वाले व्यक्तित्व सामने आते हैं। मुजफ्फरनगर निवासी फैजुर रहमान ऐसी ही एक शख्सियत के रूप में उभरकर सामने आए हैं, जो अपने खानदान की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाते हुए समाज में सौहार्द और एकता का संदेश दे रहे हैं। वे महान स्वतंत्रता सेनानी शैखुल हिन्द मौलाना महमूद हसन और कारी तैय्यब साहब के वंशज हैं। अपने बुजुर्गों की कुर्बानियों से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण को अपना जीवन लक्ष्य बना लिया है।
फैजुर रहमान की शिक्षा दीनी और आधुनिकता का सुंदर संगम है। उन्होंने प्रारंभिक धार्मिक शिक्षा के तहत मदरसा मुरादिया से हिफ्ज-ए-कुरान पूरा किया और लखनऊ स्थित नदवतुल उलेमा से मौलवियत की तालीम हासिल की। इसके साथ ही उन्होंने आधुनिक शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाते हुए नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से स्नातक (बी.ए.) की डिग्री प्राप्त की। उनका मानना है कि ज्ञान ही वह शक्ति है जो समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है।
साल 2011 से उनका सार्वजनिक जीवन सक्रिय रूप से समाजसेवा को समर्पित रहा है। उन्होंने अपने सफर की शुरुआत ह्यूमेनिटी वेलफेयर सोसाइटी से जुड़कर की। वर्ष 2012 में उन्होंने समाज के निचले तबके की 70 महिलाओं को, जो घरों में झाड़ू-बर्तन का काम करती थीं, मुफ्त शिक्षा दिलाने का कार्य किया। यह कदम महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक उल्लेखनीय प्रयास माना गया। वर्ष 2013 में वे मुस्लिम राष्ट्रीय मंच से जुड़े और राष्ट्रवाद की मुख्यधारा में सक्रिय भूमिका निभाने लगे।
वर्ष 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोध प्रदर्शनों के दौरान उन्होंने कानूनी मोर्चे पर सक्रिय भूमिका निभाई। उनका दावा है कि उन्होंने बेगुनाह मुस्लिम युवकों के नाम मुकदमों से हटवाकर उन्हें न्याय दिलाने का प्रयास किया। कोरोना महामारी के कठिन दौर 2020-21 में उन्होंने रोजाना लगभग 170 जरूरतमंद लोगों के लिए कम्युनिटी किचन चलाकर सेवा का उदाहरण प्रस्तुत किया। वर्ष 2021 में उन्होंने अपनी सामाजिक पहल को व्यापक मंच देने के उद्देश्य से भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की।
फैजुर रहमान का मूल उद्देश्य समाज में व्याप्त शिया-सुन्नी और हिंदू-मुस्लिम के बीच की खाई को पाटना है। वे “नफरत छोड़ो, भारत जोड़ो” के संदेश के साथ सभी समुदायों से अपील करते हैं कि आपसी मतभेद भुलाकर देश के विकास में योगदान दें। उनका विश्वास है कि जब हर नागरिक खुद को देश की प्रगति से जोड़ेगा, तभी भारत पुनः विश्व गुरु बनने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ेगा। उनका कहना है कि उनके बुजुर्गों ने आजादी के लिए कुर्बानियां दीं, अब उनकी जिम्मेदारी है कि वे समाज में भाईचारे और एकता की मशाल जलाए रखें।















