SC/ST एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला,

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज मामला रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि यदि कथित जातिसूचक गालियां किसी प्राइवेट घर के भीतर दी गई हों और वह स्थान “पब्लिक व्यू” यानी सार्वजनिक नजर में नहीं आता हो, तो SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध नहीं बनता।जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट किया कि इन धाराओं के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए यह जरूरी है कि घटना “ऐसी जगह” पर हुई हो जो पब्लिक की नजर में आती हो। अदालत ने कहा कि केवल निजी स्थान पर घटना होना पर्याप्त नहीं है। यदि वह निजी स्थान भी ऐसा हो जहां आम लोगों की नजर पहुंच सकती हो, तभी उसे “पब्लिक व्यू” माना जा सकता है।

हाईकोर्ट ने आरोप तय करने के आदेश में हस्तक्षेप से किया इनकार

मामला एक एफआईआर से जुड़ा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता के घर का ताला तोड़ने की कोशिश की और उसे तथा उसकी पत्नी को जातिसूचक शब्द कहे। शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति वर्ग से था। ट्रायल कोर्ट ने एक आरोपी के खिलाफ SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत आरोप तय किए थे। साथ ही सभी आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 506 और 34 के तहत भी आरोप लगाए गए थे। बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोप तय करने के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था।

निजी स्थान vs पब्लिक व्यू

सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ताओं ने दलील दी कि एफआईआर के तहत कथित घटना “पब्लिक व्यू” में नहीं हुई थी। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए एफआईआर का बारीकी से परीक्षण किया और पाया कि कथित घटना शिकायतकर्ता के आवासीय परिसर के भीतर हुई थी, न कि किसी ऐसी जगह पर जो सार्वजनिक नजर में हो। अदालत ने एक आवासीय घर अपने आप में “पब्लिक व्यू” की जगह नहीं बन जाता। जब तक वहां सार्वजनिक नजर की पहुंच न हो, तब तक SC/ST एक्ट की संबंधित धाराएं लागू नहीं होंगी। इसी आधार पर अदालत ने कहा कि मामले में आवश्यक कानूनी तत्व अनुपस्थित है, इसलिए आरोप टिक नहीं सकते। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए SC/ST एक्ट के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया।

आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही हुई बंद

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निजी घर के भीतर हुई कथित जातिसूचक गाली, यदि सार्वजनिक नजर में न हो, तो SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) लागू नहीं होंगी।
अदालत ने माना कि एफआईआर में “पब्लिक व्यू” का आवश्यक तत्व नहीं था, इसलिए आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही टिकाऊ नहीं रही।


एनबीटी लेंस

यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में “पब्लिक व्यू” की शर्त की व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से स्पष्ट हुआ कि SC/ST एक्ट में जातिसूचक टिप्पणी तभी अपराध मानी जाएगी, जब वह “पब्लिक व्यू” में हो। निजी घर के भीतर, सार्वजनिक नजर से दूर हुई घटना पर यह धारा लागू नहीं होगी। इससे भविष्य के मामलों में कानूनी सीमा और व्याख्या स्पष्ट होगी।

लाइव विडियो
विज्ञापन
क्रिकेट स्कोर
राशिफल
DELHI Weather
Recent Posts