उत्तराखंड की बहुप्रतीक्षित ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना ने निर्माण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। परियोजना की पहली निकास यानी एस्केप टनल का सफल ब्रेकथ्रू हो गया है। ढालवाला से नीर गडडू तक बनी करीब 10 किलोमीटर लंबी एस्केप टनल के दोनों छोर अब आपस में जुड़ गए हैं। इस उपलब्धि के साथ रेल विकास निगम लिमिटेड (RVNL) के इंजीनियरों और तकनीकी टीम ने परियोजना के सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सों में से एक को पार कर लिया है।
यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ढालवाला क्षेत्र परियोजना के संवेदनशील हिस्सों में शामिल है। यहां भूगर्भीय परिस्थितियां चुनौतीपूर्ण रही हैं और सुरंग निर्माण के दौरान विशेष सावधानी बरतनी पड़ी। अधिकारियों के मुताबिक अब इसी सुरंग की मुख्य सुरंग का करीब डेढ़ किलोमीटर हिस्सा ही बाकी है, जिसे जनवरी तक आर-पार करने का लक्ष्य रखा गया है।ढालवाला से नीर गडडू तक बनाई जा रही यह एस्केप टनल परियोजना की पहली बड़ी सुरंगों में शामिल है। शुक्रवार को इसके दोनों सिरों को जोड़ने का काम पूरा हुआ। ब्रेकथ्रू के दौरान मौके पर मौजूद इंजीनियरों, अधिकारियों और तकनीकी कर्मचारियों ने इस उपलब्धि पर खुशी जताई।एस्केप टनल का निर्माण मुख्य रेल सुरंग के साथ सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लंबी रेल सुरंगों में आपात स्थिति के दौरान यात्रियों और कर्मचारियों की सुरक्षित निकासी के लिए ऐसी सुरंगें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।ढालवाला-नीर गडडू सुरंग के आर-पार होने से परियोजना के निर्माण कार्य को गति मिलने की उम्मीद है। अब मुख्य सुरंग के बचे हिस्से को पूरा करने पर जोर दिया जा रहा है।
ऋषिकेश – कर्णप्रयाग है 28 सुरंगों वाली पूरी परियोजना
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना की कुल लंबाई करीब 125 किलोमीटर है। इसमें पहाड़ी भूभाग के कारण सुरंगों और पुलों का बड़ा हिस्सा शामिल है। परियोजना में कुल 28 सुरंगें बनाई जा रही हैं, जिनमें से अब तक 22 सुरंगों का निर्माण पूरा हो चुका है।परियोजना का एक बड़ा हिस्सा सुरंगों के भीतर से होकर गुजरता है। यही कारण है कि निर्माण के दौरान भूगर्भीय परिस्थितियों, चट्टानों की संरचना और जल निकासी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।रेल विकास निगम के अधिकारियों के अनुसार शेष सुरंगों पर भी काम तेजी से आगे बढ़ रहा है। पहली एस्केप टनल का ब्रेकथ्रू होने के बाद परियोजना की अन्य लंबित सुरंगों को पूरा करने की दिशा में भी गति बढ़ने की उम्मीद है।
मुख्य सुरंग का ब्रेकथ्रू जनवरी तक
ढालवाला से नीर गडडू के बीच मुख्य सुरंग का करीब डेढ़ किलोमीटर हिस्सा अभी निर्माणाधीन है। RVNL की तैयारी है कि इस हिस्से को जनवरी तक पूरा कर मुख्य सुरंग को भी आर-पार कर दिया जाए।मुख्य और एस्केप टनल का निर्माण इस क्षेत्र की कठिन भूगर्भीय परिस्थितियों के बीच किया गया है। अधिकारियों ने निर्माण के दौरान सुरक्षा को प्राथमिकता देने की बात कही है।यह ब्रेकथ्रू इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एक बार मुख्य सुरंग पूरी होने के बाद इस हिस्से में आगे ट्रैक, विद्युतीकरण, सिग्नल और अन्य रेल प्रणालियों के काम को गति दी जा सकेगी।
ट्रैक बिछाने का काम भी शुरू
परियोजना अब केवल सुरंग खोदने के चरण तक सीमित नहीं है। इसी वर्ष मई से कुछ हिस्सों में ट्रैक बिछाने का काम भी शुरू हो चुका है। शिवपुरी से गूलर के बीच सुरंग के अंदर करीब डेढ़ किलोमीटर ट्रैक बिछाया जा चुका है। इस हिस्से में कुल छह किलोमीटर ट्रैक बिछाने की योजना है।इससे संकेत मिलता है कि परियोजना के विभिन्न हिस्सों में निर्माण के अलग-अलग चरण समानांतर रूप से आगे बढ़ रहे हैं। सुरंगों और पुलों का निर्माण पूरा होने के साथ ट्रैक, सिग्नलिंग, दूरसंचार, बिजली और स्टेशन निर्माण के कार्यों को भी गति दी जा रही है।
13 स्टेशन बनाए जाने हैं
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना में करीब 13 स्टेशन प्रस्तावित हैं। इनमें बीरभद्र और योगनगरी ऋषिकेश जैसे स्टेशन पहले ही तैयार हो चुके हैं। शिवपुरी और ब्यासी सहित अन्य स्टेशनों पर भी चरणबद्ध तरीके से निर्माण कार्य आगे बढ़ रहा है।परियोजना पूरी होने के बाद ऋषिकेश से गढ़वाल के अंदरूनी क्षेत्रों तक रेल संपर्क मजबूत होगा। इससे स्थानीय आबादी के साथ-साथ तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को भी बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है।
यात्रा का समय होगा काफी कम
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन का सबसे बड़ा लाभ पहाड़ी क्षेत्रों में यात्रा के समय में कमी के रूप में सामने आने की उम्मीद है। सड़क मार्ग से जिन स्थानों तक पहुंचने में कई घंटे लगते हैं, वहां रेल संपर्क बनने के बाद यात्रा अधिक सुगम और व्यवस्थित हो सकती है।परियोजना के तहत यात्री ट्रेनों की अधिकतम गति 100 किलोमीटर प्रति घंटा और मालगाड़ियों की अधिकतम गति करीब 65 किलोमीटर प्रति घंटा प्रस्तावित है। परियोजना में 19 पुल भी बनाए जा रहे हैं।रेल संपर्क मजबूत होने से चारधाम यात्रा और बदरीनाथ, केदारनाथ समेत गढ़वाल के प्रमुख धार्मिक एवं पर्यटन क्षेत्रों तक पहुंच को अप्रत्यक्ष रूप से सुविधा मिलने की उम्मीद है।
गढ़वाल के लिए रणनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण
यह रेल परियोजना केवल यात्री सुविधा की दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं है। यह उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों को देश के व्यापक रेल नेटवर्क से जोड़ने वाली रणनीतिक परियोजना भी मानी जाती है।ऋषिकेश से आगे रेल लाइन बनने से गढ़वाल क्षेत्र में परिवहन व्यवस्था मजबूत होगी। इससे सामान की आवाजाही, पर्यटन, स्थानीय कारोबार और आपदा के समय राहत सामग्री पहुंचाने की क्षमता में भी सुधार हो सकता है।परियोजना का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि उत्तराखंड का पहाड़ी भूभाग सड़क निर्माण और परिवहन के लिए कठिन माना जाता है। रेल सुरंगों और पुलों के माध्यम से ऐसे क्षेत्रों में अपेक्षाकृत सुरक्षित और नियमित परिवहन व्यवस्था विकसित की जा सकती है।
दिसंबर 2028 तक परियोजना पूरी करने का लक्ष्य
परियोजना की समयसीमा में पहले कई बदलाव हो चुके हैं। अब RVNL ने इसे पूरा करने के लिए दिसंबर 2028 का लक्ष्य रखा है। अधिकारियों का कहना है कि परियोजना के विभिन्न हिस्सों पर काम तेजी से किया जा रहा है और समयसीमा के भीतर निर्माण पूरा करने की कोशिश जारी है।परियोजना की अनुमानित लागत करीब 16,216 करोड़ रुपये बताई गई है। इसका निर्माण वर्ष 2019 में शुरू हुआ था और इसमें बड़ी संख्या में सुरंगों और पुलों का निर्माण शामिल है।























































