कोलन और रेक्टम से जुड़ा कैंसर, जिसे मेडिकल भाषा में कोलोरेक्टल कैंसर कहा जाता है, दुनिया भर में तेज़ी से बढ़ती गंभीर बीमारियों में शामिल हो चुका है। यह कैंसर बड़ी आंत या रेक्टम में विकसित होता है और इसकी सबसे बड़ी चुनौती यही है कि शुरुआती स्टेज में यह बिना किसी स्पष्ट लक्षण के धीरे-धीरे बढ़ता रहता है। इसी वजह से कई मामलों में मरीज तब डॉक्टर के पास पहुंचता है, जब बीमारी एडवांस स्टेज में पहुंच चुकी होती है। जबकि सच यह है कि अगर समय रहते इसकी पहचान हो जाए, तो न सिर्फ इसे कंट्रोल किया जा सकता है बल्कि पूरी तरह ठीक होने की संभावना भी काफी बढ़ जाती है।
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, नोएडा के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रिंसिपल डायरेक्टर एंड यूनिट हेड डॉ. एस. एम. शोएब ज़ैदी के अनुसार कोलोरेक्टल कैंसर को लेकर जागरूकता बेहद जरूरी है। उनका कहना है कि यह कैंसर इसलिए खतरनाक है क्योंकि शुरुआत में यह ‘खामोश’ रहता है। 45 साल की उम्र के बाद हर व्यक्ति को नियमित स्क्रीनिंग करानी चाहिए। वहीं जिन लोगों के परिवार में कैंसर का इतिहास रहा है या जिनकी जीवनशैली में जोखिम कारक मौजूद हैं, उन्हें इससे पहले ही जांच शुरू कर देनी चाहिए। स्क्रीनिंग को सिर्फ एक मेडिकल टेस्ट नहीं बल्कि अपनी सेहत के प्रति जिम्मेदारी के रूप में देखना चाहिए। इसके जरिए प्री-कैंसरस पॉलिप्स को समय रहते हटाया जा सकता है और कैंसर को शुरुआती अवस्था में पकड़ा जा सकता है, जब इलाज सबसे ज्यादा असरदार होता है।
हालांकि शुरुआती दौर में लक्षण दिखाई नहीं देते, लेकिन शरीर कुछ संकेत जरूर देता है जिन्हें नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है। स्टूल में खून आना या उसका रंग काला होना, पेट में लगातार दर्द या ऐंठन, बिना किसी वजह वजन कम होना, बार-बार दस्त या कब्ज की समस्या, पेट पूरी तरह साफ न होने का एहसास या अचानक हीमोग्लोबिन का कम हो जाना—ये सभी ऐसे लक्षण हैं जिन पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
अच्छी बात यह है कि कोलन को स्वस्थ रखना मुश्किल नहीं है। फाइबर से भरपूर भोजन, हरी सब्जियां, फल, होल ग्रेन्स का सेवन, पर्याप्त मात्रा में पानी पीना, नियमित वॉक या व्यायाम, प्रोसेस्ड फूड और शराब से दूरी जैसे छोटे-छोटे कदम इस कैंसर के खतरे को काफी हद तक कम कर सकते हैं। कोलोरेक्टल कैंसर सिर्फ उम्रदराज लोगों की बीमारी नहीं रह गया है, बल्कि आज के समय में यह एक आम और वास्तविक चुनौती बन चुका है। जागरूकता, सही जीवनशैली और समय पर जांच के जरिए इस बीमारी को हराया जा सकता है। खुद के लिए और अपनों के लिए इस पर बात शुरू करना ही एक स्वस्थ भविष्य की सबसे मजबूत नींव है।















