उत्तर प्रदेश की नौ विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव के लिए जातीय समीकरण का खेल चरम पर है, जहां सत्ताधारी भाजपा, सपा और बसपा अपनी-अपनी रणनीतियों के साथ मैदान में उतर चुकी हैं। प्रमुख पार्टियों ने जातियों के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों का चयन किया है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ “बंटेंगे तो कटेंगे” के संदेश के साथ हिंदू वोटों को एकजुट करने पर जोर दे रहे हैं, जबकि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव “जुड़ेंगे तो जीतेंगे” के नारे के साथ अपने पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को दोहराने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा और सपा, दोनों ही पार्टियों का विशेष फोकस ओबीसी वोट बैंक पर है। भाजपा ने विभिन्न ओबीसी जातियों से उम्मीदवार उतारे हैं, तो वहीं सपा ने मुस्लिम और ओबीसी समुदाय के उम्मीदवारों पर जोर दिया है।लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी को ओबीसी वोटों का समर्थन मिला था, जिसका लाभ उपचुनाव में भी उठाने की रणनीति बनाई गई है। भाजपा ने ओबीसी वोटों को बांटने के लिए विभिन्न जातियों के नेताओं को मैदान में उतारकर ओबीसी में बिखराव की नीति अपनाई है। वहीं, बसपा ने भी जातीय संतुलन को साधने के लिए विभिन्न जातियों के उम्मीदवार खड़े किए हैं, जो चुनाव को और भी दिलचस्प बना रहे हैं।हर विधानसभा सीट का जातीय समीकरण अलग है, जिसके चलते एक सीट पर जो जाति एक पार्टी के साथ खड़ी नजर आती है, वह दूसरी सीट पर दूसरी पार्टी के साथ दिखाई दे रही है।















