हाल ही में अमेरिकी होमलैंड सिक्योरिटी विभाग (DHS) और ट्रंप प्रशासन द्वारा जारी प्रस्तावित नियमों ने भारत की आईटी इंडस्ट्री, वहां पढ़ाई कर रहे लाखों भारतीयों छात्रों और वर्क वीजा पर काम करने वाले प्रोफेश्नल्स के बीच गहरी चिंता पैदा कर दी है. इस प्रस्ताव के तहत, सालाना वीजा सीमा के दायरे में आने वाली हर नई H-1B अर्जी पर अमेरिकी नियोक्ताओं (Employers) को $103,265 (लगभग 86 लाख रुपये) का भारी-भरकम शुल्क देना होगा.
यह नया प्रस्ताव उस पहले के फैसले का एक अलग रूप है जिसे जून में एक अमेरिकी अदालत ने खारिज कर दिया था. 24 अगस्त को फेडरल रजिस्टर में जारी इस नोटिस पर 30 दिनों का जन-परामर्श (Public Comments) मांगा गया है और उम्मीद है कि इसे वर्ष के अंत तक अंतिम रूप दिया जा सकता है.
इसके अतिरिक्त, OPT (ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग) पर भी $100,000 का शुल्क लगाने पर विचार किया जा रहा है. यदि ये प्रस्ताव पूरी तरह लागू होते हैं, तो यह बीते कई दशकों में अमेरिकी कानूनी आव्रजन की लागत के ढांचे में सबसे बड़ा बदलाव साबित होगा.
1. प्रमुख नीतियां और शुल्क संरचना
अमेरिकी सरकार केवल नए H-1B आवेदनों पर ही शुल्क बढ़ाने का विचार नहीं कर रही है, बल्कि मौजूदा कर्मचारियों के एक्सटेंशन (वीजा नवीनीकरण) पर भी नया वित्तीय बोझ डालने की तैयारी में है:
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नई H-1B अर्जी पर शुल्क: प्रति नई अर्जी पर $103,265 का नया प्रस्तावित शुल्क लागू करने की योजना है.
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वीजा एक्सटेंशन पर सरचार्ज: 9 सितंबर से DHS उन बड़ी कंपनियों से प्रति H-1B एक्सटेंशन पर $4,000 और L-1 एक्सटेंशन पर $4,500 का सरचार्ज वसूलेगा, जिनके 50% से अधिक कर्मचारी इन्हीं वीजा पर कार्यरत हैं. यह ‘9/11 रिस्पॉन्स एंड बायोमेट्रिक एंट्री-एग्जिट फीस’ का हिस्सा है.
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OPT प्रोग्राम पर नया शुल्क: विदेशी स्नातकों के लिए उपलब्ध पोस्ट-ग्रेजुएशन वर्क परमिट (OPT) पर $100,000 का अतिरिक्त शुल्क लगाने पर अलग से विचार किया जा रहा है.
2. भारतीय आईटी सेवा क्षेत्र पर सीधा प्रभाव
भारतीय आईटी कंपनियां (जैसे TCS, Infosys, Wipro, HCL) और अमेरिकी टेक दिग्गज (जैसे Cognizant) का पारंपरिक बिजनेस मॉडल भारत से योग्य सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को क्लाइंट लोकेशंस (अमेरिका) में लंबी अवधि के असाइनमेंट पर भेजने पर टिका रहा है.
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कारोबारी लागत में अप्रत्याशित बढ़ोतरी: हर असाइनमेंट के लिए वीजा एक्सटेंशन की जरूरत होती है. अब नए भर्तियों पर ही नहीं, बल्कि मौजूदा कर्मचारियों के वीजा रिन्यूअल पर भी $4,000 से $4,500 का सरचार्ज लागू होने से भारतीय आईटी कंपनियों का परिचालन खर्च (Operating Cost) काफी बढ़ जाएगा.
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स्थानीय अमेरिकी प्रतिभाओं पर निर्भरता: अत्यधिक फीस से बचने के लिए आईटी कंपनियां भारत से इंजीनियरों को अमेरिका भेजने के बजाय स्थानीय अमेरिकी नागरिकों या ग्रीन कार्ड धारकों की भर्ती करने के लिए मजबूर होंगी.
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ऑफशोरिंग और रिमोट वर्क का विस्तार: अत्यधिक लागत के चलते कंपनियां अमेरिका में ऑन-साइट टीमों को छोटा करेंगी और ज्यादातर प्रोजेक्ट्स को भारत या अन्य कम लागत वाले देशों (Nearshore Locations) से रिमोटली संचालित करने पर जोर देंगी.
3. भारतीय छात्रों के भविष्य और OPT पर असर
भारत वर्तमान में अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों का सबसे बड़ा स्रोत है. वित्त वर्ष 2025 में सभी H-1B वर्करों में से लगभग 70% भारतीय थे.
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शिक्षा के बाद रोजगार का संकट: अधिकांश भारतीय छात्र अमेरिका की महंगी यूनिवर्सिटीज से डिग्री लेने के बाद 1 से 3 साल के OPT अवधि के दौरान काम करते हैं और बाद में H-1B वीजा में स्विच करने की कोशिश करते हैं.
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स्पॉन्सरशिप से कतराएंगी कंपनियां: यदि किसी नए छात्र को H-1B में बदलने के लिए कंपनी को $103,265 का शुल्क देना पड़े, तो छोटी और मध्यम स्तर की अमेरिकी कंपनियां विदेशी फ्रेशर्स को स्पॉन्सर करने से पूरी तरह हाथ पीछे खींच सकती हैं.
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एजुकेशन लोन चुकाने की चुनौती: भारी-भरकम फीस देकर अमेरिका पढ़ने गए छात्रों के लिए यदि डिग्री के बाद काम करने का अवसर नहीं मिलता है, तो उनके लिए एजुकेशन लोन का भुगतान करना बहुत मुश्किल हो जाएगा.
4. श्रम बाजार, प्रतिस्पर्धा और वीजा आवेदकों पर प्रभाव
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अत्यधिक प्रतिस्पर्धा: भविष्य में कंपनियां केवल अति-विशिष्ट कौशल (High-Skilled) वाले और वरिष्ठ भूमिकाओं के लिए ही H-1B स्पॉन्सरशिप की लागत वहन करेंगी. सामान्य आईटी भूमिकाओं के लिए आवेदन खारिज हो सकते हैं.
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वेतन संरचना में बदलाव: नियोक्ता इस अतिरिक्त लागत की भरपाई करने के लिए विदेशी कर्मचारियों के शुरुआती वेतन पैकेज में कटौती कर सकते हैं.
ट्रंप प्रशासन के ये कदम अमेरिकी आव्रजन नीति को बेहद सख्त और महंगा बनाने का एक स्पष्ट प्रयास हैं. भारत के लिए, जो अमेरिका में सबसे ज्यादा तकनीकी कार्यबल और छात्र भेजता है, यह फैसला अत्यंत संवेदनशील है. यदि ये नियम अपने मूल रूप में लागू होते हैं, तो इससे न केवल भारतीय आईटी सेवा क्षेत्र की लाभप्रदता पर असर पड़ेगा, बल्कि अमेरिकी उच्च शिक्षा प्रणाली में भारतीय छात्रों के आकर्षण में भी बड़ी गिरावट आ सकती है.























































