नहाय-खाय के अगले दिन खरना पूजन का दिन होता है. यह छठ पूजा का दूसरा दिन है, जिसे ‘खरना’ या ‘लोहंडा’ भी कहते हैं. यह दिन व्रती यानी छठ का व्रत रखने वाले के लिए बेहद सबसे अधिक पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी दिन से असली तपस्या और भक्ति की शुरुआत होती है.आइए जानते हैं कि खरना पूजा क्या है, इसका धार्मिक महत्व क्या है और इस दिन बनाए जाने वाले प्रसाद की विशेषता क्या है?
खरना पूजा क्या है?
‘खरना’ शब्द का अर्थ होता है पा,पों का क्षय और आत्मा की शुद्धि. छठ पूजा के इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला यानी बिना अन्न-जल के उपवास रखते हैं और सूर्यास्त के बाद स्नान-पूजन कर प्रसाद ग्रहण करते हैं. इस प्रसाद को ग्रहण कर अगले दो दिन के कठिन व्रत की शुरुआत होती है. यही कारण है कि खरना को आत्मसंयम, पवित्रता और भक्ति का प्रतीक माना गया है.
खरना पूजा का धार्मिक महत्व
खरना का दिन साधक और सूर्य देव के बीच एक सेतु की तरह माना जाता है. इस दिन व्रती सूर्य देव से आशीर्वाद की कामना करते हैं कि वे आगामी दो दिनों का व्रत शुद्धता और निष्ठा से पूरा कर सकें. मान्यता है कि खरना पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य का संचार होता है. यह दिन केवल पूजा का नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि और मन की शांति का पर्व है.
खरना प्रसाद में क्या बनता है?
खरना पूजा के प्रसाद की बात करें तो इसमें सादगी और पवित्रता का गहरा संदेश छिपा होता है. मुख्य रूप से दो चीजें बनाई जाती हैं:
रसिया खीर: दूध, चावल और गुड़ से बनने वाली यह रसिया खीर ‘मिठास और संतोष का प्रतीक मानी जाती है. इसमें चीनी का प्रयोग नहीं होता है. इसलिए इसे गुड़ की खीर भी कहते हैं.
सोहारी: बेहद कम देसी घी में हल्की सेंकी गई एक प्रकार की पतली रोटी है, जिसे सोहारी कहते हैं. इसे श्रम, साधना और पूजा की बारीकी का प्रतीक माना है.
आपको बता दें कि छठ पूजा के प्रसाद को केवल मिट्टी, पीतल या कांसा के बर्तनों में बनाया जाता है ताकि उसकी पवित्रता बनी रहे.
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है.















