पश्चिम एशिया में तेजी से बदलते हालात के बीच सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए ने एक नए रक्षा समझौते का ऐलान किया है. इस समझौते को ‘मक्का डील’ का नाम दिया गया है. इसका मकसद तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाना, सैन्य समन्वय मजबूत करना और किसी बड़े सुरक्षा संकट की स्थिति में एक-दूसरे का साथ देना है. इसे क्षेत्र में उभरते नए रणनीतिक गठबंधन के रूप में देखा जा रहा है. दरअसल, सऊदी अरब के मक्का शहर में यह समझौता हुआ, इसलिए इसका नामकरण हुआ, लेकिन भविष्य में इसे इस्लामिक शक्ति संगठन के रूप में पेश किया जा सकता है.
क्या अब ईरान से टकराव होने पर तीनों देश एक साथ लड़ेंगे?
इस समझौते का मतलब यह नहीं है कि अगर सऊदी अरब पर हमला होता है तो पाकिस्तान और तुर्किए अपने आप युद्ध में उतर जाएंगे. नाटो के आर्टिकल 5 की तुलना में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. ऐसा फैसला हालात और तीनों देशों की सरकारों के राजनीतिक फैसले पर निर्भर करेगा. जरूरत पड़ने पर वो खुफिया जानकारी साझा कर सकते हैं, हथियार और सैन्य सहायता दे सकते हैं या सीमित सैन्य सहयोग कर सकते हैं. सीधे युद्ध में शामिल होना अंतिम विकल्प माना जाएगा.
क्या सऊदी अरब अब अमेरिका से दूर हो रहा है?
विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब अमेरिका से रिश्ते खत्म नहीं कर रहा, बल्कि अपनी सुरक्षा के लिए नए विकल्प तलाश रहा है. पिछले कुछ सालों में अमेरिका ने पश्चिम एशिया में अपनी प्रत्यक्ष सैन्य भूमिका कम की है. ऐसे में सऊदी अरब अब तुर्किए और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ भी रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है. हालांकि उसकी सेना अब भी काफी हद तक अमेरिकी हथियारों और तकनीक पर निर्भर है.
भारत, इजराइल और यूएई पर क्या होगा असर?
भारत के लिए यह समझौता पूरी तरह नकारात्मक नहीं माना जा सकता. पाकिस्तान को इससे राजनीतिक और रणनीतिक समर्थन मिल सकता है, लेकिन सऊदी अरब भारत का बड़ा आर्थिक और ऊर्जा साझेदार भी है. इसलिए भारत के साथ अपने रिश्तों को नुकसान पहुंचाना उसके हित में नहीं होगा. वहीं, इजराइल इस नए समीकरण पर नजर रखेगा, क्योंकि तुर्किए और पाकिस्तान पहले से उसकी नीतियों के आलोचक रहे हैं. दूसरी ओर, यूएई इस गठबंधन से बाहर है और वह अमेरिका, भारत और इजराइल के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की नीति पर आगे बढ़ रहा है.
क्या बदल जाएगी पश्चिम एशिया की राजनीति?
मक्का डील का संदेश है कि पश्चिम एशिया में अब केवल अमेरिका पर निर्भर रहने का दौर बदल रहा है. क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा के लिए नए साझेदार तलाश रहे हैं. हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह गठबंधन नाटो जैसी मजबूत सैन्य व्यवस्था बन जाएगा. इसकी असली ताकत तभी सामने आएगी, जब भविष्य में कोई बड़ा क्षेत्रीय संकट पैदा होगा.























































