देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने अस्थायी श्रमिकों (Casual Labourers) के सामाजिक अधिकार को लेकर एक बड़ा नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक मामले की सुनवाई करते हुए साफ तौर पर कहा कि किसी सरकारी विभाग में लंबे समय तक लगातार काम करने वाले अनियत श्रमिक भी पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभों (Pensionary Benefits) के हकदार हैं।जस्टिस संजय करोल और जस्टिस अरविंद कुमार मसीह (Justices Sanjay Karol and A G Masih) की पीठ ने सरकार की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि ऐसे कर्मचारियों को पेंशन देने से सरकारी खजाने पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा।
एक विधवा महिला की 18 साल की कानूनी लड़ाई रंग लाई
यह ऐतिहासिक फैसला बिहार की एक गरीब विधवा महिला के संघर्ष का नतीजा है, जिसके पति ने डाक विभाग (Department of Posts) में करीब तीन दशकों (30 साल) तक एक अस्थायी कर्मचारी (नाईट गार्ड) के रूप में अपनी सेवाएं दी थीं। पति की मौत के बाद सरकार ने यह कहकर पेंशन देने से मना कर दिया था कि वे एक ‘अस्थायी कर्मचारी’ थे और उन्हें कभी औपचारिक रूप से नियमित (Regularise) नहीं किया गया था।इस महिला ने हार नहीं मानी और 18 साल लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT), पटना हाई कोर्ट और अंत में सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ने के बाद आखिरकार सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार की याचिका को खारिज करते हुए महिला के पक्ष में फैसला सुनाया।
‘पेंशन कोई खैरात नहीं, कर्मचारियों का संवैधानिक अधिकार है’
अदालत ने सरकार को फटकार लगाते हुए बेहद तल्ख टिप्पणी की। पीठ ने कहा, ‘पेंशन कोई खैरात, अनुग्रह या भीख (Bounty or Grace) नहीं है, जिसे नियोक्ता अपनी वित्तीय सुविधा या मर्जी के अनुसार दे या न दे। यह एक कर्मचारी का प्रवर्तनीय संवैधानिक अधिकार (Enforceable Constitutional Right) है, जिसे उसने अपने जीवन के लंबे और बहुमूल्य वर्ष सेवा में देकर कमाया है। यह एक स्थगित मजदूरी (Deferred Wage) की तरह है।’मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को 3 महीने के भीतर सभी बकाए का भुगतान करने का आदेश दिया है, ऐसा न करने पर 6% का ब्याज देना होगा। मामले में भेदभाव पर सुप्रीम कोर्ट सख्त नजर आया।















