हिमालय में बर्फ का सूखा: दिसंबर की जगह अब फरवरी में बर्फबारी, पिघलने की रफ्तार बढ़ने से बढ़ा जल संकट का खतरा

हिमालय क्षेत्र में तेजी से बदलते जलवायु पैटर्न के बीच वैज्ञानिकों ने ‘बर्फ के सूखे’ की गंभीर चेतावनी जारी की है। आमतौर पर दिसंबर और जनवरी में होने वाली बर्फबारी अब लगातार देरी से फरवरी में शिफ्ट होती जा रही है। इस बदलाव ने न केवल हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित किया है, बल्कि क्षेत्र के जल संसाधनों पर भी बड़ा खतरा पैदा कर दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, देर से होने वाली बर्फबारी वसंत और गर्मियों में जल्दी पिघल जाती है, जिससे ग्लेशियरों की स्थिरता प्रभावित होती है और पिघलने की गति पहले की तुलना में काफी बढ़ गई है।

तापमान में हो रही निरंतर वृद्धि से हिमालयी नदियों में पानी की उपलब्धता अनियमित होती जा रही है। गर्मियों में अत्यधिक पिघलाव से अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है, जबकि सर्दियों में पानी की कमी से जल संकट गहराता है। इससे उत्तर भारत के कई राज्यों—जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और नेपाल—में पेयजल, कृषि और बिजली उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह स्थिति इसी तरह जारी रही, तो आने वाले वर्षों में हिमालयी क्षेत्र जलवायु अस्थिरता का सबसे बड़ा केंद्र बन सकता है।

पारिस्थितिकी विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बर्फ के सूखे का प्रभाव केवल पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी प्रमुख नदियों के प्रवाह पर असर पड़ेगा, जो करोड़ों लोगों के जीवन और अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। वैज्ञानिकों ने तुरंत कदम उठाने की अपील की है, जिनमें ग्लेशियर मॉनिटरिंग बढ़ाना, कार्बन उत्सर्जन कम करना, जल संरक्षण योजनाओं को मजबूत करना और स्थानीय समुदायों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाने पर जोर दिया गया है। सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को मिलकर इस संकट से निपटने के लिए ठोस और समयबद्ध रणनीति तैयार करनी होगी।

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