नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की एक हालिया रिसर्च में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि भारत में बच्चों में ऑटिज्म (Autism Spectrum Disorder – ASD) के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। यह स्थिति न केवल माता-पिता और डॉक्टरों के लिए चिंता का विषय बन गई है, बल्कि स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इसे आने वाले समय में एक बड़ी चुनौती बताया है।
AIIMS की रिपोर्ट के मुताबिक, हर 100 में से 1 से 1.5 बच्चे में ऑटिज्म के लक्षण पाए जा रहे हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह आंकड़ा पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा है, और इसका मुख्य कारण बदलती जीवनशैली, पर्यावरणीय प्रदूषण, गर्भावस्था के दौरान मां के स्वास्थ्य पर असर डालने वाले कारक, और जेनेटिक बदलाव हो सकते हैं।
AIIMS के न्यूरोलॉजी विभाग के विशेषज्ञों ने बताया कि समय से पहले जन्म (प्रीमैच्योर डिलीवरी), जन्म के समय कम वजन, मां के शरीर में फोलिक एसिड की कमी, थायरॉयड असंतुलन और गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक तनाव जैसी स्थितियां भी ऑटिज्म के जोखिम को बढ़ा सकती हैं।
इसके अलावा, डिजिटल डिवाइसेज जैसे मोबाइल, टैबलेट और टीवी का अत्यधिक इस्तेमाल, खासकर 3 साल से कम उम्र के बच्चों में, संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित कर सकता है। यह भी एक संभावित कारण माना जा रहा है कि बच्चे सामाजिक संवाद और भावनात्मक जुड़ाव में पिछड़ रहे हैं।
क्या है ऑटिज्म?
ऑटिज्म एक न्यूरो-डेवलपमेंटल डिसऑर्डर है, जिसमें बच्चा बोलने, समझने, सामाजिक संपर्क और व्यवहार में कठिनाई महसूस करता है। इसके लक्षण आमतौर पर 2 से 3 साल की उम्र तक सामने आने लगते हैं।
समाधान और सुझाव:
AIIMS के विशेषज्ञों ने जोर दिया है कि यदि ऑटिज्म के लक्षणों को जल्दी पहचान लिया जाए, तो थेरेपी और विशेष शिक्षा के माध्यम से बच्चे के जीवन को बेहतर बनाया जा सकता है। उन्होंने माता-पिता को सलाह दी है कि वे बच्चे के विकास पर नजर रखें और किसी भी असामान्यता की स्थिति में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
सरकार से यह भी अपील की गई है कि देश भर में ऑटिज्म के लिए स्क्रीनिंग और जागरूकता अभियान चलाए जाएं, ताकि समय पर पहचान और उपचार सुनिश्चित हो सके।















