SIR केस की सुनवाई के दौरान आधार कार्ड की विश्वसनीयता एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। कोर्ट में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार पैसे देकर फर्जी आधार बनवाए जाने और घुसपैठियों के पास भी आधार कार्ड पाए जाने की घटनाओं ने न्यायालय को गंभीर रूप से चिंतित कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि आधार कार्ड एक महत्वपूर्ण पहचान दस्तावेज है, लेकिन इसे सामाजिक विकास से जुड़े योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान के लिए बनाया गया था, न कि नागरिकता या मतदान के अधिकार की पुष्टि के लिए। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि यदि कानूनी नागरिक न होने वाले लोग आधार कार्ड हासिल कर सकते हैं, तो क्या भविष्य में उन्हें वोटिंग अधिकार देने की मांगें भी सामने आ सकती हैं, जो देश की लोकतांत्रिक संरचना के लिए खतरनाक हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आधार कार्ड किसी भी व्यक्ति को वोट डालने का अधिकार नहीं देता और न ही यह नागरिकता का प्रमाण है। इसके बावजूद विभिन्न राज्यों में इसके दुरुपयोग और संदिग्ध लोगों के पास इसकी मौजूदगी निश्चित रूप से प्रशासनिक खामियों और सुरक्षा जोखिमों को उजागर करती है। अदालत ने चिंता जताते हुए कहा कि पहचान प्रणाली में इस तरह की कमजोरियां राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं, इसलिए इस पर कड़े कदम उठाने की जरूरत है।इस मामले में पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों द्वारा SIR के फैसलों, विशेषकर इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी। सुनवाई के दौरान उठे सवालों ने देश में पहचान दस्तावेजों की विश्वसनीयता को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। अदालत ने संकेत दिया कि फर्जी पहचान से जुड़े मामलों में कठोर निगरानी और बेहतर सत्यापन तंत्र की आवश्यकता है, ताकि आधार प्रणाली का दुरुपयोग रोका जा सके और इसे अपने मूल उद्देश्य के अनुरूप सुरक्षित और प्रभावी बनाया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने एक बार फिर कहा, “आधार कार्ड पूरी तरह से नागरिकता साबित नहीं करता है. इसीलिए हमने कहा कि SIR में एक डॉक्यूमेंट आधार कार्ड होगा. अगर किसी का नाम छूट गया है, तो उसे नोटिस देना होगा.”
आधार कार्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने कही ये बात
आधार एक्ट में यह भी कहा गया है कि यह डॉक्यूमेंट नागरिकता या डोमिसाइल साबित नहीं करता है. इसका जिक्र करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “आधार कई तरह के फायदे पाने के लिए बनाया गया है. अगर किसी व्यक्ति को राशन लेने के लिए आधार कार्ड दिया जाता है, तो क्या उसे भी वोटर बना दिया जाएगा? मान लीजिए कोई पड़ोसी देश का नागरिक है. वह इस देश में मजदूरी करता है.”सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इलेक्शन कमीशन को वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने के लिए फॉर्म-6 एप्लीकेशन में जमा किए गए डॉक्यूमेंट्स के सही होने को वेरिफाई करने का अधिकार है. इलेक्शन कमीशन कोई पोस्ट ऑफिस नहीं है.पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु में SIR प्रोसेस को चुनौती देने वाले मामलों में चुनाव आयोग से 1 दिसंबर तक जवाब मांगा गया है. केस करने वाले जवाब भी दे सकते हैं. इस मामले में राज्यों की तरफ से सीनियर वकील कपिल सिब्बल लड़ रहे हैं.
SIR प्रोसेस पर कपिल सिब्बल ने जताई चिंता
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि SIR प्रोसेस ने आम आदमी पर बेवजह दबाव डाला है. उन्होंने कहा, कई वोटर अनपढ़ हैं. फॉर्म भरना वोटरों की जिम्मेदारी नहीं है. कई अनपढ़ हैं. वे पढ़-लिख नहीं सकते. अगर वे फॉर्म नहीं भर सकते, तो उनके नाम हटा दिए जाएंगे. अगर नाम वोटर लिस्ट में है, तो उसे वैलिड माना जाएगा, जब तक कि राज्य कुछ और न कहे. अगर कोई नाम हटाया जाता है, तो यह एक सही और निष्पक्ष प्रोसेस से किया जाना चाहिए.कपिल सिब्बल ने कहा, हालांकि आधार कार्ड नागरिकता का सबूत नहीं है, लेकिन यह नागरिकता के पक्ष में सबूत है. मेरे पास आधार कार्ड है. यह मेरा घर है. इस प्रोसेस में इसे छीना जा रहा है. जस्टिस जयमाल्या बागची ने कहा कि मरे हुए वोटरों के नाम वोटर लिस्ट से हटाना जरूरी है.सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल में SIR को खास तौर पर चुनौती देने वाली पिटीशन पर सुनवाई का शेड्यूल भी तय किया. बेंच ने इलेक्शन कमीशन से 1 दिसंबर तक जवाब दाखिल करने को कहा है. पिटीशनर फिर अपने जवाब दाखिल कर सकते हैं और उसके तुरंत बाद मामलों पर सुनवाई होगी.















