पीएम मोदी ने जार्जिया मेलोनी को दी ये ₹1 वाली टॉफी,

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन विदेश यात्रा पर हैं. पांच देशों की यात्रा के अंतिम पड़ाव में वे अब इटली पहुंचे हैं. पीएम मोदी ने इटली की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी से मुलाकात की हैं और उन्‍हें एक खास गिफ्ट भी दिया है, जिसे पाकर वो काफी खुश हैं.इसका वीडियो भी मेलोनी ने सोशल मीडिया पर शेयर किया है. दरअसल, पीएम मोदी ने मेलोनी को भारतीय कंपनी पार्ले प्रोडक्‍ट्स की चॉकलेट टॉफी मेलोडी (Melody) का पैकेट दिया है. पार्ले प्रोडक्‍ट्स ही मशहूर पारले-जी बिस्किट बनाती हैं. भारत में पारले मेलोडी की एक टॉफी की कीमत एक रुपया है.

पारले प्रोडक्‍ट्स की स्‍थापना 97 साल पहले मुंबई में हुई थी और शुरुआत में इसका नाम ‘हाउस ऑफ पार्ले’ था. आज यह कंपनी 21 से ज्यादा देशों में अपने प्रोडक्‍ट बेचती हैं और देश में इसकी सवा सौ से ज्‍यादा फैक्‍टरियां हैं. इसकी स्थापना मोहनलाल दयाल ने इसकी स्‍थापना कैंडी बनाने के लिए की थी. 1939 से कंपनी ने ‘पार्ले ग्लूको नाम से बिस्किट बनाने शुरू किए. पार्ले जी आज बिस्कुट के अलावा चॉकलेट, टॉफी, केक, रस्क, स्नैक्स, ब्रेकफास्ट सीरियल और आटा भी बनाती औ बेचती है. पार्ले-जी के अलावा हाइट एंड सीक, क्रैकजैक, मोनाको, किस्मी, मेलोडी और पार्ले रस्क आदि इसके मशहूर प्रोडक्‍ट्स हैं.

परिवार के ही 12 लोगों के साथ शुरू किया बिजनेस

मोनलाल ने 12 लोगों के साथ अपनी फैक्‍टरी की शुरुआत की. ये सभी मोहनलाल के ही परिवार के सदस्य थे. पारले ने फैक्ट्री शुरू होने के 10 साल बाद 1939 में बिस्किट बनाना शुरू किया. उस वक्त तक भारत में मिलने वाला बिस्किट बाहर से आयात किया जाता था, इसलिए महंगा होता था. पारले ने अपने बिस्किट को आम जनता के लिए सस्ती कीमत पर लॉन्च किया. देखते ही देखते यह पॉपुलर हो गया. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश-इंडियन आर्मी में भी पारले बिस्किट की भारी डिमांड थी.

आजादी के बाद ठप पड़ा बिस्किट प्रोडक्‍शन

1947 में भारत को आजादी मिली. उस साल पाकिस्तान विभाजन भी हुआ और अचानक देश में गेहूं की कमी हो गई. पारले को अपने ग्लूको बिस्किट का उत्पादन रोकना पड़ा क्योंकि गेहूं इसका मुख्य स्रोत था. इस संकट से उबरने के लिए पारले ने जौ से बने बिस्किट बनाने शुरू कर दिए.

1960 के दशक तक कई अन्य ब्रांड ने भी ग्लूकोज बिस्किट लॉन्च कर दिए. इससे कंज्यूमर में कन्फ्यूजन होने लगा और इसका असर पारले बिस्किट की बिक्री पर पड़ने लगा. कंपनी ने नई पैकेजिंग बनाई और पारले एक पीले वैक्स पेपर में लपेटकर आने लगा. इसके ऊपर लाल रंग के पारले ब्रांडिंग के साथ एक छोटी लड़की की तस्वीर होती थी.

पारले ग्लूको बन गया पारले-G

नई ब्रांडिंग आकर्षक तो थी, लेकिन अन्य ग्लूकोज बिस्किट से पारले कैसे अलग दिखे, ये समस्या जस की तस थी. साल 1982 में पारले ग्लूको को पारले-जी के रूप में री-पैकेज किया गया. इसमें G का मतलब था ग्लूकोज. पैकिंग को भी वैक्स पेपर से बदलकर कम कीमत वाले प्रिंट प्लास्टिक कवर में कर दिया गया. इससे इसकी अलग ही पहचान बन गई.

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