पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा विवाद का मूल कारण डूरंड रेखा (Durand Line) है। यह लगभग 2,640 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जिसे 1893 में ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव सर हेनरी मोर्टिमर डूरंड और अफगानिस्तान के अमीर अब्दुर रहमान खान के बीच एक समझौते के तहत खींचा गया था।
इस रेखा का उद्देश्य ब्रिटिश भारत और अफगान साम्राज्य के बीच प्रभाव क्षेत्रों को अलग करना था। समझौते के अनुसार, अफगानिस्तान की सत्ता डूरंड रेखा तक सीमित रहेगी, जबकि इसके पार का क्षेत्र ब्रिटिश नियंत्रण में रहेगा। हालांकि, यह रेखा पश्तून जनजातीय इलाकों को दो हिस्सों में बाँटती थी, जिससे सामाजिक और सांस्कृतिक असंतोष पैदा हुआ।
अफगानिस्तान इस समझौते को ब्रिटिशों द्वारा जबरन थोपा गया मानता है और तर्क देता है कि यह औपनिवेशिक युग की अन्यायपूर्ण संधि थी। 1919 में तीसरे एंग्लो-अफगान युद्ध के बाद जब अफगानिस्तान ने ब्रिटेन से स्वतंत्रता प्राप्त की, तो उसने डूरंड रेखा को वैध अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में स्वीकार नहीं किया। 1921 की संधि में ब्रिटिशों ने इसे फिर से मान्यता दी, लेकिन अफगान शासकों ने इसे स्थायी सीमा नहीं माना।
1947 में भारत के विभाजन के बाद जब पाकिस्तान अस्तित्व में आया, तो उसने डूरंड रेखा को अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमा घोषित कर दिया। वहीं, अफगानिस्तान ने इसे मानने से इनकार करते हुए पाकिस्तान के पश्चिमी सीमा क्षेत्रों (खासकर पश्तून इलाकों) पर अपना ऐतिहासिक दावा बनाए रखा।















