देश में धर्म के नाम पर किस तरह पॉलिटिक्स हो रही है, इसका जीता-जागता उदाहरण केरल और पश्चिम बंगाल है. दोनों राज्यों में हाल ही में नई सरकारें आई हैं. केरल में जहां यूडीएफ ने सत्ता संभाली है.वहीं पश्चिम बंगाल में पहली बार बीजेपी सत्ता में आई है. इस बदलती राजनीतिक तासीर का एक बेहद दिलचस्प और विरोधाभासी उदाहरण इस साल की बकरीद की छुट्टियों के सरकारी आदेशों में साफ देखने को मिल रहा है. पूर्व और दक्षिण के दो प्रमुख राज्यों पश्चिम बंगाल और केरल ने एक ही त्योहार को लेकर दो बिल्कुल अलग और विपरीत राहें चुनी हैं. जहां एक तरफ बंगाल की शुभेंदु अधिकारी सरकार अपने हिंदुत्व और कड़े फैसलों के एजेंडे पर आगे बढ़ते हुए पूर्ववर्ती ममता सरकार की छुट्टियों की लिस्ट को छोटा कर रही है, वहीं केरल की नवगठित कांग्रेस समर्थित यूडीएफ सरकार ने इस बड़े मुस्लिम त्योहार के सम्मान में दो दिनों की आधिकारिक छुट्टी का ऐलान कर अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं को स्पष्ट कर दिया है.
इस पूरे विवाद की जड़ में केरल सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा एक आधिकारिक सरकारी आदेश है, जिसमें बकरीद की छुट्टी दो दिन कर दिया गया है. इस आधिकारिक नोटिफिकेशन के मुताबिक, केरल सरकार ने पहले से तय कैलेंडर के आधार पर 27 मई 2026 को बकरीद (ईद-उल-अजहा) की छुट्टी घोषित की थी. लेकिन राज्य में चांद दिखने और त्योहार के वास्तविक दिन को ध्यान में रखते हुए राज्यपाल के आदेश पर सचिव के. बीजू (IAS) द्वारा यह नया आदेश जारी किया गया है कि अब गुरुवार, 28 मई 2026 को भी पूरे राज्य में अतिरिक्त अवकाश रहेगा.

बकरीद की छुट्टी पर सियासत
केरल सरकार के इस नोटिफिकेशन में स्पष्ट किया गया है कि 28 मई को राज्य के सभी सरकारी कार्यालयों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs), व्यावसायिक और व्यावसायिक कॉलेजों सहित सभी शैक्षणिक संस्थानों और ‘नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट-1881’ के तहत आने वाले सcकेरल सरकार का यह फैसला मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं और त्योहार के पारंपरिक महत्व को देखते हुए लिया गया है, लेकिन सोशल मीडिया पर इस फैसले को लेकर दक्षिणपंथी यूजर इसे ‘वोट बैंक की राजनीति’ और ‘तुष्टीकरण’ की संज्ञा दे रहे हैं.
बंगाल में एक दिन तो केरल में दो दिन की छुट्टी
इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल की राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है. वहां हाल ही में मुख्यमंत्री बने भाजपा के फायरब्रांड नेता शुभेंदु अधिकारी लगातार ऐसे कड़े फैसले ले रहे हैं जो सीधे तौर पर पूर्ववर्ती तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार के वोट बैंक समीकरणों पर चोट करते हैं. शुभेंदु सरकार ने बंगाल की पुरानी छुट्टी नीति को पलटते हुए साफ कर दिया है कि राज्य में अब कार्य संस्कृति को बढ़ावा दिया जाएगा और त्योहारों के नाम पर अनावश्यक लंबी छुट्टियां नहीं मिलेंगी. इसी कड़ी में बंगाल प्रशासन ने बकरीद की पारंपरिक लंबी छुट्टियों में बड़ी कटौती करते हुए उसे घटाकर केवल एक दिन का कर दिया है. इसके साथ ही खुले में कुर्बानी और लाउडस्पीकर पर रोक जैसे सख्त नियम पहले ही लागू किए जा चुके हैं.
केरल सरकार का नोटिफिकेशन
केरल और बंगाल की इस प्रशासनिक तुलना ने इंटरनेट पर एक बड़ा वैचारिक युद्ध छेड़ दिया है. सोशल मीडिया पर बकरीद को लेकर दो राज्यों के अलग-अलग फैसले की चर्चा हो रही है. लोग लिख रहे हैं कि एक तरफ जहां बंगाल ‘योगी मॉडल’ पर चलते हुए तुष्टीकरण की राजनीति को उखाड़ फेंक रहा है, वहीं केरल की सरकारें आज भी अपने विशेष वोट बैंक को रिझाने के लिए सरकारी खजाने और कामकाजी दिनों की परवाह किए बिना दो-दो दिनों की छुट्टी बांट रही हैं.
इसके उलट, केरल सरकार के समर्थकों का तर्क है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष और बहुसांस्कृतिक देश है, जहां सभी बड़े समुदायों के त्योहारों को उचित सम्मान मिलना चाहिए और केरल की यूडीएफ सरकार ने हमेशा की तरह राज्य की मिली-जुली संस्कृति और सौहार्द को बरकरार रखने का बेहतरीन काम किया है. बहरहाल, 2026 की इस बकरीद ने देश के दो कोनों में चल रही दो विपरीत राजनीतिक विचारधाराओं को पूरी तरह आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया है.















