औरैया 1699 में आनंदपुर साहिब (पंजाब) में सिक्खों के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने अमृत छकाकर सिक्ख पंथ की स्थापना की थी। उन्होंने पंज पियारों को अमृत पान कराकर खालसा पंथ की नींव रखी, जिसका अर्थ होता है शुद्ध और धर्म के लिए अपना सब कुछ बलिदान करने वाला। उस समय मुगलों के अत्याचार बढ़ रहे थे और औरंगजेब की सेना हिंदू धर्म के लोगों पर अत्याचार कर रही थी। ऐसे समय में गुरु गोविंद सिंह ने 40 लोगों की एक सेना बनाई और खालसा रूप दिया, जिसमें कंघा, कच्छा, किरपाण, केश और कड़ा पहनना अनिवार्य कर दिया गया। ये ही खालसा लोग अत्याचारियों का सामना करते और उन्हें खदेड़ देते थे। इस ऐतिहासिक दिन को आज भी सिक्ख समाज बैसाखी के रूप में मनाता है। औरैया में आयोजित कार्यक्रम में जिलाधिकारी इंद्रमणि त्रिपाठी ने गुरुद्वारा पहुंचकर मत्था टेका और सिक्ख धर्म के संघर्षों पर प्रकाश डाला। कई दिनों से चल रहे गुरु ग्रंथ साहिब के पाठ का समापन हुआ, इसके बाद गुरु वाणी, कीर्तन, कथा और विशाल लंगर का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में सदर एसडीएम राकेश कुमार, नायब तहसीलदार प्रकाश चौधरी सहित कई प्रशासनिक अधिकारी और समाजसेवी शामिल हुए। आयोजन को सफल बनाने में जगदीप सिंह चंपी, मनजीत सिंह जोहरी, गोल्डी, अमरजीत, शैलू, सोनू सब्बरवाल, हनी, रेशु, कीरत, महिंदर सिंह, मंगी सरदार, चांदी मास्टर, कालका प्रसाद, सुच्चे बाबू और संजू चड्ढा सहित अन्य लोगों का योगदान रहा।















