देश के लिए समर्पित फौजी अक्सर अपनी निजी जिम्मेदारियों से भी दूर हो जाते हैं। ऐसा ही एक भावुक मामला सामने आया, जब सीमा पर तैनात दो पोते अपनी दादी की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हो सके। दोनों पोते भारतीय सेना में कार्यरत हैं और इस समय देश की सीमाओं की रक्षा में जुटे हैं। जैसे ही उन्हें दादी के निधन की खबर मिली, उन्होंने छुट्टी के लिए आवेदन किया, लेकिन सीमावर्ती क्षेत्र की संवेदनशील स्थिति के कारण उन्हें तत्काल छुट्टी नहीं मिल पाई। परिवार की तरफ से बताया गया कि दोनों पोते दादी से बेहद जुड़े थे, लेकिन देश की सेवा को प्राथमिकता देते हुए वे अपने कर्तव्य से नहीं हटे। दादी की अंतिम यात्रा के समय परिवार और गांव वालों की आंखें नम थीं, पर सभी ने एक स्वर में कहा कि देश के सच्चे सपूत होने का गर्व उन्हें भी है। यह घटना न केवल परिवार की मजबूरी को दर्शाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि सैनिकों को किस तरह निजी भावनाओं को पीछे छोड़ना पड़ता है। यह कहानी हर नागरिक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि फौजियों का त्याग सिर्फ युद्ध में ही नहीं, जीवन के हर मोड़ पर होता है।















