बढ़ती लागत और घटते उत्पादन के बीच MSP बढ़ोतरी पर किसानों में नाराजगी,

मुजफ्फरनगर। भारतीय किसान यूनियन अराजनैतिक ने केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2026-27 के विपणन सीजन के लिए खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP ) में की गई वृद्धि को किसानों के हित में अपर्याप्त बताते हुए इस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है। संगठन का कहना है कि सरकार ने जिन फसलों में अधिक एमएसपी वृद्धि की घोषणा की है, उनका उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है, जबकि धान जैसी प्रमुख फसल में केवल 72 रुपये प्रति क्विंटल यानी करीब 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी किसानों के साथ न्याय नहीं करती। संगठन के अनुसार सरकार यह दावा कर रही है कि किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिया जा रहा है, लेकिन मौजूदा हालात में यह वृद्धि खेती की बढ़ती लागत के मुकाबले बेहद कम साबित होगी।

भाकियू अराजनैतिक ने कहा कि वर्तमान समय में किसान कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव का सीधा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ा है, जिसके चलते कीटनाशक, उर्वरक, पोषक तत्व और खरपतवारनाशक दवाओं की कीमतों में लगभग 30 प्रतिशत तक वृद्धि हो चुकी है। खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि किसानों की आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ पा रही। संगठन ने चेतावनी दी कि जलवायु परिवर्तन और अल नीनो के प्रभाव के कारण वर्ष 2026-27 में फसलों के उत्पादन में भारी गिरावट आने की आशंका है। ऐसे में यदि किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिला तो उनकी आर्थिक स्थिति और अधिक कमजोर होगी।

संगठन ने यह भी कहा कि सरकार द्वारा सूरजमुखी के बीज पर 622 रुपये, कपास पर 557 रुपये, नाइजरसीड पर 515 रुपये और तिल पर 500 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई है, लेकिन इन फसलों का उत्पादन सीमित क्षेत्रों में होता है। देश के अधिकांश किसान धान और अन्य प्रमुख फसलों पर निर्भर हैं, इसलिए इन फसलों के एमएसपी में पर्याप्त वृद्धि आवश्यक थी। भाकियू अराजनैतिक का कहना है कि मौजूदा निर्णय से विशेष रूप से चावल उत्पादक किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ेगा और खेती घाटे का सौदा बनती जाएगी। संगठन ने केंद्र सरकार से किसानों की वास्तविक लागत और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए एमएसपी में दोबारा संशोधन करने की मांग की है।

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