नीट-यूजी परीक्षा में अनियमितताओं को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बीच धर्मेंद्र प्रधान को केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। अब शिवसेना (यूबीटी) नेता व पूर्व राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इस आंदोलन के साथ ही मंडल आंदोलन को याद किया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक पर एक वीडियो भी पोस्ट किया है। इस वीडियो के कैप्शन में उन्होंने लिखा- 1990 के मंडल विरोध प्रदर्शन। वीपी सिंह के दौर में हुए छात्र आंदोलनों को याद करते हुए… 60 छात्रों की मौत हुई और 200 से ज्यादा ने आत्मदाह का प्रयास किया।’
वीडियो में प्रियंका चतुर्वेदी ने 1990 के एंटी-मंडल आंदोलन को भारत के छात्र आंदोलनों के इतिहास का सबसे अहम मोड़ बताया। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन ने भारत की शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के शिक्षा को देखने के नजरिए को प्रभावित किया। प्रियंका ने कहा, उस समय एंटी-मंडल विरोध प्रदर्शन सभी छात्र परिसरों में भड़क उठे थे, जिनमें 60 से अधिक छात्रों की मौत हुई और 200 से अधिक लोगों ने आत्मदाह का प्रयास किया।
The Mandal protests of 1990. Looking back at the student protests during the VP Singh era…. 60 students died and over 200 attempted self immolation. pic.twitter.com/4iG5saIz01
— Priyanka Chaturvedi🇮🇳 (@priyankac19) August 1, 2026
‘IIT दिल्ली में पढ़ाई कर रहे थे पति’
उन्होंने अपने पति का जिक्र करते हुए बताया कि उस समय वह दिल्ली स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली में छात्र थे और उन्होंने भी आंदोलन में हिस्सा लिया था, जिसके चलते उन्हें हिरासत में लिया गया था। पूर्व सांसद ने बताया कि 7 अगस्त 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का ऐलान किया था। इसके तहत ओबीसी के लिए केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई।
प्रिंयका चतुर्वेदी ने कहा, उस समय भारत को धड़ों में बंट गया। वी. पी. सिंह और उनकी सरकार के समर्थकों के लिए यह ऐतिहासिक सामाजिक न्याय था, जिसने सत्ता पर एकछत्र अधिकार को तोड़ा। आलोचकों के लिए, यह एक राजनीतिक वोट बैंक की चाल थी जिसने अकादमिक योग्यता की हत्या कर दी।
कब हुई थी शुरूआत
उन्होंने बताया कि मंडल आयोग की स्थापना 1979 में हुई थी और इसकी अध्यक्षता बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल ने की थी। आयोग ने देश में ओबीसी आबादी का अनुमान करीब 52 प्रतिशत बताया था और उनके लिए आरक्षण की सिफारिश की थी।
कैंपस बने आंदोलन का मैदान
शिवसेना (यूबीटी) नेता ने कहा, आरक्षण लागू होने के बाद रातोंरात देशभर के कई कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। खासकर उत्तर भारत के छात्र परिसरों में आंदोलन तेज हुआ। प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि इससे योग्यता आधारित अवसर प्रभावित होंगे, जबकि सरकार और समर्थकों ने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में कदम बताया।
60 छात्रों की जलने से मौत
उन्होंने कहा, सितंबर 1990 में दिल्ली में, राजीव गोस्वामी नाम के 20 वर्षीय छात्र ने अपने ऊपर केरोसिन डाला और लाइव टेलीविजन पर माचिस जला ली। वह बच तो गया, लेकिन उसने पूरे भारत में एक भयानक चेन रिएक्शन शुरू कर दी। 200 से अधिक युवा छात्रों ने आत्मदाह का प्रयास किया, जिसमें 60 छात्रों की जलने से मौत हो गई। यह युवाओं और राज्य (सरकार) के बीच एक भयानक, अभूतपूर्व टकराव था।प्रियंका चतुर्वेदी ने वीडियो में कहा, यह लड़ाई 1992 में सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गई। उन्होंने बताया कि 9192 में, सर्वोच्च न्यायालय ने 27% कोटे को बरकरार रखा, लेकिन समृद्ध लोगों को इसके लाभों से बाहर रखने के लिए ‘क्रीमी लेयर’ का नियम जोड़ दिया।पूर्व सांसद ने कहा मंडल आंदोलन ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी और देश में पहचान आधारित राजनीति को मजबूत किया। उन्होंने मौजूदा छात्र आंदोलनों का जिक्र करते हुए कहा कि कैंपस लंबे समय से सरकार और व्यवस्था के खिलाफ युवाओं की आवाज का केंद्र रहे हैं। प्रियंका ने कहा, दशकों बाद, जैसे ही एक नई पीढ़ी पेपर लीक को लेकर संस्थागत पारदर्शिता के लिए जंतर-मंतर पर बैठती है, मंडल का मुख्य सबक बना रहता है: कैंपस ही भारतीय राज्य का अंतिम प्रहरी है।























































