सुप्रीम कोर्ट में मैरिटल रेप (वैवाहिक बलात्कार) मामले की सुनवाई हुई है. इस दौरान सीनियर एडवोकेट करुणा नंदी ने कोर्ट के सामने ऐसे तीन मामले पेश किए. जबकि सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने बताया कि इस खास मामले में एक FIR शामिल है जो पहले ही दर्ज हो चुकी है, और इसे रद्द करने की मांग वाली एक याचिका भी है. इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या शादी का मतलब किसी व्यक्ति की आजादी का खत्म होना है?इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट करुणा नंदी ने बताया कि मैरिटल रेप (वैवाहिक बलात्कार) मामले में “हमने एक लिस्ट तैयार की है. मैं इनमें से तीन मामलों में पेश हो रही हूं. मेरे मामले को मुख्य मामला (लीड मैटर) माना गया था. मेरे साथियों के शुरू करने से पहले, मैं ‘पॉइंट 1’ पर बात करना चाहती हूं. एक खास मामला है जिसे, हमारी राय में, दूसरों से अलग किया जाना चाहिए.वहीं, सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने बताया कि इस खास मामले में एक FIR शामिल है जो पहले ही दर्ज हो चुकी है, और इसे रद्द करने की मांग वाली एक याचिका भी है. बाकी मामले मुख्य रूप से कानून के सिद्धांतों से जुड़े हैं. वे कानून की वैधता और संवैधानिक चुनौतियों से संबंधित हैं. इसलिए, उस खास मामले को पहले अलग करना सही रहेगा.”
अगले महीने से शुरू होगी सुनवाई
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि यह सवाल भी उठता है कि किसी व्यक्ति को उसके आचरण के लिए कैसे सजा दी जा सकती है, जब अपराध को ही एक खास तरीके से परिभाषित किया गया हो. मैरिटल रेप मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, क्या शादी का मतलब किसी व्यक्ति की आजादी का खत्म होना है? क्या मैरिटल रेप के लिए कानूनी कार्रवाई की जा सकती है? सुप्रीम कोर्ट अगले महीने से मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई शुरू करेगा.
शादी से महिला की आजादी खत्म नहीं होती
जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने निर्देश दिया कि इस मामले को अब से तीन सप्ताह बाद बुधवार और गुरुवार को अंतिम सुनवाई के लिए लिस्ट किया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश केंद्र सरकार द्वारा मामले में अपना हलफनामा दाखिल करने के बाद दिया. सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, शादी से महिला की व्यक्तिगत आजादी खत्म नहीं होती, हालांकि, मैरिटल रेप के लिए मुकदमा चलाने की अनुमति देने से पहले, कोर्ट को BNS (भारतीय न्याय संहिता) के तहत मौजूदा कानूनी अपवाद पर विचार करना होगा.
दो सवालों की जांच करेगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह दो सवालों की जांच करेगा. पहला, क्या मैरिटल रेप का अपवाद लागू रहने के बावजूद मुकदमा चलाना संभव है और दूसरा, क्या यह अपवाद खुद संवैधानिक रूप से वैध है. इस संबंध में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस अपवाद के दायरे को सीमित करने के असर की जांच करेगा. वह इस बात पर भी विचार करेगा कि क्या किसी ऐसे काम को, जिसे अपराध की श्रेणी से स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है, न्यायिक व्याख्या के माध्यम से उसके दायरे में लाया जा सकता है.
क्या है पूरा मामला?
वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) को अपराध घोषित करने की मांग करने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना रुख स्पष्ट करते हुए इसका कड़ा विरोध किया था. मैरिटल रेप को अपराध बनाने का विरोध- केंद्र सरकार ने अपने 49 पृष्ठों के हलफनामे में स्पष्ट किया था कि भारत में मैरिटल रेप को क्राइम (अपराध) के दायरे में लाने की आवश्यकता नहीं है. हालांकि सरकार ने माना कि किसी भी पति के पास अपनी पत्नी की सहमति का उल्लंघन करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन विवाह जैसी सामाजिक संस्था के तहत इस उल्लंघन को बलात्कार कहना अत्यधिक कठोर और असंगत होगा.























































